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प्राय: तनाफुर को इतना महत्त्व दिया जाता रहा है जितने का यह हक़दार नहीं है.तनाफुर को ये नाम मौलाना हसरत मोहानी ने अपनी किताब ‘मआइबे सुखन’ में दिया था जो उर्दू में शायरी के ऐबों पर लिखी गई पहली किताब थी (बाद में इसे निकाते-सुखन का हिस्सा बना दिया गया). तनाफुर की मौलाना हसरत मोहानी की परिभाषा है :

 ‘जब शेर में दो अल्फाज(शब्द) मुत्तसिल(adjoining - एक साथ ) पास आ जाते हैं जिन में से पहले लफ्ज़ का हर्फे आखिर (आखिरी अक्षर) वही होता है जो दूसरे लफ्ज़ का हर्फे अव्वल (पहला अक्षर) होता है तो इन दोनों हर्फों के एक साथ तलफ़्फ़ुज(उच्चारण) में एक किस्म का सक़्ल (गुरुत्विकरण) और नागवारी पैदा हो जाती है – इसका नाम एबे-तनाफुर है.’ 

                                                                                                                  - निकाते सुखन, पृष्ठ 129

मौलाना हसरत मोहानी के अनुसार तनाफुर दो तरह के होते है :

१.तनाफुरे ज़ली(स्पष्ट) - यह वहाँ होता है जहाँ दो शब्दों में से पहले शब्द के आखिरी अक्षर पर कोई मात्रा नहीं होती. जैसे :

मत सहल हमें जानों फिरता है फलक बरसों

तब खाक के परदे से इंसान निकलते हैं

                                             मीर तकी मीर

यहाँ ‘खाक के’ में तनाफुरे ज़ली है.

२.तनाफुरे ख़फी(लुप्त) – यह वहाँ होता है जहाँ दो शब्दों में से पहले शब्द के आखिरी अक्षर पर मात्रा होती है लेकिन उच्चारण में दब जाती है. जैसे :

गुलों  में   रंग  भरे    वादे  -  नौ - बहार   चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

                                         फैज़ अहमद फैज़

बहर के हिसाब से यह शेर 'मुज्तस मुसम्मन मखबून महफूज मकतू' है (मुफाइलुन  फइलातुन मुफाइलुन फैलुन - 1212 11 22 1212 112) और बहर के हिसाब से उच्चारण में ‘का’ दबता है और तनाफुरे ख़फी की सूरत पैदा हो जाती है.

बहर का ख्याल न भी करें तो ‘का कारोबार’ को एक साथ पढ़ने पर में ‘का’ दबता है और उच्चारण में सक़्ल और नागवारी पैदा हो जाती है जो तनाफुर का मुख्य लक्षण है.

 

लेकिन तानाफुर दरअसल एक गलती है ऐब नहीं. इसे ऐब क्यों मान लिया गया इसपर टिप्पणी करते हुए शम्सुर्रहमान फारूकी ने अपनी किताब ‘अरूज़, आहंग और बयान’ में लिखा है :

 ‘’मौलाना हसरत मोहानी ने अपनी किताब मआइबे सुखन में गड़बड़ी ये की है कि वो ऐब और गलती को एक ही दर्जे में रख गए हैं , बल्कि उनका ज्यादातर जोर गलतियाँ दिखाने पर सर्फ़ हुआ है ऐब की तरफ उनहोंने कम तवज्जः की है.’’

   

एबे तानाफुर, तक़ाबुल-ए-रदीफ़ेन, तश्दीदे लफ्जी वगैरह ऐसी ही गलतियां हैं जिन्हें ऐब में शुमार कर लिया गया. अब सवाल ये है कि ऐब और गलती में फर्क क्या है? फारूकी साहब के शब्दों में :

 “गलती महज गलती है अगर न हो तो अच्छा लेकिन इसकी मौजूदगी में भी शेर अच्छा हो सकता है, इसके बरखिलाफ ऐब एक खराबी है और शेर की मुस्तकिल खराबी का बायस होता है. शेर में अगर ऐब है तो शेर अच्छा नहीं हो सकता गलती है तो मुमकिन है गलती के बाद भी शेर अच्छा हो

यह सब कुछ लिखने का मक़सद ये नहीं है कि हम जितनी चाहे गलतियाँ करनी शुरू कर दें. गलतियाँ अनिवार्य स्थितियों में ही स्वीकार्य होती हैं. हाँ लेकिन शेर अच्छा हो तो किसी छोटी-मोटी गलती के चक्कर में उसका क़त्ल नहीं करना चाहिए.

शेर में कोई भी सुधार शेर को और बेहतर बनाने के लिए होता है. अगर गलती को ठीक करने के बाद शेर पहले से कमजोर हो रहा हो तो ऐसा कोई भी सुधार अपने आप में गलती है.  

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Replies to This Discussion

आ. भाई अनुराग जी , इस नायाब जानकारी से परिचित कराने के लिए हार्दिक आभार ।

आदरणीय अनुराग जी, तथ्य को सोदाहरण तर्क के साथ प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक धन्यवाद. गलती और ऐब के बीच का अंतर भी स्पष्ट होना आवश्यक था. जनाब शमसुर्रहमान फ़ारुक़ी साहब उर्दू भाषा और ग़ज़ल विधा के अंतरराष्ट्रीय विद्वान हैं. उनके अकाट्य कई तर्क बोहेमियन किस्म के हैं जिनको ले कर परंपरागत अनुमन्यता संभव नहीं है. अक़्ल लगानी ही पड़ेगी.

उनके सान्निध्य में उनको सुनने का सौभाग्य हम इलाहाबदियों को मिलता रहा है. 

शुभ-शुभ

आदरणीय अनुराग जी, आपने जानकारी को बहुत ही सटीक और सार्थक ढंग से रखी, इसके लिए मैं हृदय से धन्यवाद देता हूँ. 

शुभ-शुभ

धन्यवाद आदरणीय अनुराग जी सादर प्रणाम ये बहुत सहायक जानकारी है

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