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मनुष्य जीवन से हमारा तात्पर्य है, मनुष्य के पैदा होने से मृत्यु तक का समय । ईश्वर के महत्व को समझने के पहले यह समझना जरुरी है कि ईश्वर क्या है?

ईश्वर एक अनवरत बहने वाली धारा है ।ईश्वर प्रकृति का दूसरा नाम है। ईश्वर अविनाशी, अविकारी, परम सत्य है। ईश्वर का ना कोई रंग है , न कोई रूप है, ये बस है,  इसको  ना हम देख सकते है, ना छू सकते है, केवल महसूस कर सकते है। मनुष्य जीवन का मूल आधार आत्मा है और ईश्वर परम-आत्मा यानि परमात्मा। यह सभी बातें हमारे धर्मगुरू, हमारे बुज़ुर्ग, हमारी धार्मिक पुस्तकें विस्तार से और तरह - तरह  के विशलेषणों से बताती है।

ईश्वर को जानने के लिए आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन कि आवश्यकता होती है। एक गुरु ही है जो ईश्वर का बोध करा सकता है, उससे रुबरु करा सकता है।

ईश्वर के बारे मै हम इतन ही कह सकते है कि कोई शक्ति है जो इस दुनिया को इस ब्रहमांड को चला रही है इसका संतुलन बना रही है और शायद इसी शक्ति का नाम ईश्वर है।

मनुष्य जीवन में ईश्वर का महत्व मनुष्य के पैदा होने के साथ ही शुरू हो जाता है, बल्कि पैदा होने के पहले ही शुरू हो जाता है, । माँ के अण्डाणु (ओवरी) में जो बीज होता है वो ईश्वर का दिया हुआ ही है ये मनुष्य को जन्मजात ईश्वर का मिला वरदान ही है । यह कुदरत कि ही व्यवस्था है कि माँ के गर्भ मैं ही भ्रूण का विकास होता है। एक कोशीय भ्रूण से मनुष्य शरीर के सारे अंग बनते है, ह्रदय में धड़कन पैदा होती है, शिराओ में रक्त बहता है, आँख , कान, नाक बनते है। बच्चे के पैदा होते ही उसके सांस कि जरुरत कुदरत कि वायु ही पूरा करती है ।

भ्रूण से शिशु, शिशु से बालक, तरुण, युवावस्था तक विकास होता है फिर अधेड़ उम्र, बुढ़ापा और अंत में मृत्यु। यह प्रकृति का नियम है, इस पर हमारा अंकुश नहीं, ये व्यव्यस्था अनवरत चलती रहती है . ईश्वर कि बनाई व्यव्यस्था का मनुष्य जीवन में महत्व इस कदर है कि वो ही निशिचत करता है कि अमुक मनुष्य कि शारीरिक रचना कैसी होगी, उसकी कद काठी, आँखो कि पुतली का रंग, और बालो का रंग, उसके मस्तिष्क का विकास कितना होगा। हम तो इतना भी निर्धारित नहीं कर सकते कि हमे किस घर में जन्म  लेना है।

ईश्वर का महत्व मनुष्य के सुबह उठने से रात को सोने तक और नींद में भी है। सुबह हम तरोताजा उठते है। दिनभर कि थकान से शारीर में कई तरह के हानिकारक रसायन इकट्ठे हो जाते है;  रात के आराम के समय निष्क्रिय कर दिए जाते है, कैसे? ये ईश्वर  द्वारा हमारे ही शरीर में बनाई गई व्यव्यस्था से संभव होता है।

हमारी मूलभूत आवश्यकता रोटी, कपडा, और मकान कौन  पूरी करता है ? ईशवर ही !  माना मनुष्य मेहनत करता है, बुद्धि तत्त्व का इस्तमाल करके पैसा कमाता है लेकिन रोटी के लिए गेहुं, कपड़ो के लिए कपास और मकान के लिए चूना भाटा उसे प्रकृति से ही मिल जाता है।


हम अगर अपने चारो तरफ देखे तो ईश्वर की  मेहरबानियों का नज़ारा ही नज़ारा नज़र आता है। चाँद, तारे, सूरज, आकाश, पृथ्वी, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह, समुंदर, नदियाँ , पर्वत, जंगल, ऋतुए इन सबका मनुष्य के रोजमर्रा के जीवन से बहुत गहरा संबंध है इन सबका नियंता कौन है? शायद ईश्वर ही ।


हम सोचते है मनुष्य ने बहुत तरक्की कर ली है, बड़ी-बड़ी खोजे कि है। हवाई जहाज़ बनाया, रेल, टीवी, फ्रिज, नईं नईं मशीने बना ली है, कंप्यूटर बनाया, चाँद तक  गए, जीनोम तैयार कर लिए, बड़ी बड़ी बीमारियों का इलाज़ ढूंढ लिया, लेकिन गहराई से सोचे तो जो खोजे हमने कि है, वे मात्र खोज है, प्रकृति में वो पहले ही मौज़ूद थी। हमारे आविष्कार उसकी सृष्टी  के सामने तुच्छ  है। खुद मनुष्य ईश्वर का बनाया एक सुपर कंप्यूटर है।


ईश्वर का मनुष्य जीवन में महत्व इस कदर है कि उसके बिना एक क्षण भी जिन्दा रहना असम्भव है । मुर्दा और जिन्दा मनुष्य में क्या भेद है? मुर्दे में सभी तत्व आँख, नाक, कान, हृदय, फेफड़े होते है फिर भी वो किसी भी काम नहीं क्योकि, उसमे ईश्वर का अंश आत्मा नहीं है जो जीवन का मूल तत्व है ।


अंत में हम केवल इतना ही कह सकते है कि मनुष्य के जीवन में हर एक पल ईश्वर की  जरुरत है। पैदा होने से मृत्य़ु तक, सुबह उठने से रात सोने तक ईश्वर कि व्यव्स्था हमारी मदद करती है । हमारी जरूरते रोटी, कपडा और मकान ईश्वर ही पूरी करता है । हमे अपने चारो तरफ केवल ईश्वर कि सत्ता ही नज़र आती है । ईश्वर के महत्व को कहा तक बखान किया जाए, ये हमारे वश मैं नहीं है, हम तो केवल इतना केह सकते है कि - उसकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता।

"मौलिक व अप्रकाशित" 


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