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Raz Nawadwi: In the Labyrinth of My Mystical Alleys-2 (मेरी रहस्यवादी वीथी के व्यामोह में-२)

मुझे द्वंद्वों, द्वैतों, समासों, अपवर्त्यों, अथवा विभक्तियों में जीने की कोई आवश्यकता नहीं, जिन्हें जाने अनजाने मैंने स्वयं ही अपने ऊपर लाद लिया है. 

मैं हिंदूं हूँ या कि मुसलमां, मैं भारतीय हूँ या कि जापानी, मैं कांग्रेसी हूँ या कि समाजवादी, मैं बिहारी हूँ या कि उत्तराखंडी, अथवा.....मैं स्त्री हूँ या कि पुरुष---- मुझे सदैव इन्हें याद रख के जीने की ज़रूरत नहीं है. 

ह्रदय की धड़कन एवं श्वास की निरंतरता उनसे सचेत हुए बिना अधिक सहजता से बनी रहती हैं. ब्रह्माण्डीय स्वप्न से बाहर निकलने के लिए चरित्रों और चित्रों- दोनों से ऊपर उठना ही होगा अन्यथा ‘इक छोटी-सी बड़ी उम्र’ नाना तुच्छताओं के तादात्म्य को जीते, निभाते, और और लड़ते बीत जाती है.

जीवन की मृगमरीचिका के पश्चात मृत्यु के मरुस्थल में एकाकी एवं आत्मनिष्ठ होकर जिन्हें मनन कर आत्मसात करना है, उन पाठों को जीवन रहते सीख लेने में ही भलाई है. 

मेरे और सब के अन्दर बसने वाले हे ईश्वर! मुझे दृश्य से अदृश्य और, अस्तित्व से अनस्तित्व की ओर ले चल! 

© राज़ नवाद्वी
भोपाल बुधवार ०३/०४/२०१३ 
प्रातःकाल ०७:४५
 

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