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V.M.''vrishty''
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बरसात

ये नाज़ुक से नगीने-जिनसे करके श्रृंगार,इठलाता है,सदाबहार!यूँ तोबहुत शीतल हैं..मखमली हैं !पर इन्हें छूते ही,अधरों से,जिस्म मेंआग सी जली है!ये एहसास कुछजाना पहचाना-सा है !तेरे अधरों की तरहइनमें भी,,मयखाना-सा है!मौलिक व अप्रकाशितSee More
4 hours ago
V.M.''vrishty'' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
"आदरणीय शिज़्ज़ु शकूर जी, प्रणाम! शुभ संध्या! हौसलाअफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया"
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"आदरणीय डॉ छोटेलाल जी,प्रणाम! हार्दिक धन्यवाद! आपकी प्रशंसा पा कर मेरे सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि हुई। सादर"
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"जनाब मिर्ज़ा जावेद जी,सादर अभिनंदन। बहुत बहुत शुक्रिया सुख़न नवाज़ी के लिए"
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"आदरणीय अजय गुप्ता जी,शुभ संध्या! बहुत बहुत धन्यवाद आपका"
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"आदरणीय प्रभाकर सर, प्रणाम! बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल!  तीसरा छठा और सातवाँ शेर विशेष आकर्षक है। बहुत बहुत बधाई"
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"आदरणीय समर कबीर सर,,सादर नमन! सच कहूँ तो आपके इस्लाह के बगैर ये सम्भव नही था मेरे लिए। इस मुबारकबाद के असली हकदार आप ही हैं। बहुत बहुत शुक्र गुज़ार हूँ मैं आपकी! सादर!"
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"जनाब राज नवादवी जी,आदाब! आपकी दाद के लिए शुक्रगुज़ार हूँ। सादर"
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"आदरणीय राजेश जी,प्रणाम! बहुत बहुत दिली शुक्रिया"
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"जनाब अफ़रोज़ जी,आदाब! बहुत बहुत शुक्रिया"
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"आदरणीय समर सर,प्रणाम! आपकी ग़ज़ल भी आप ही कि तरह हरदिल अज़ीज़ है,बेहद खूबसूरत रचना एक निराले अंदाज में। बहुत बहुत दिली मुबारकबाद!"
yesterday
V.M.''vrishty'' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-100
"कोई ऐसे सता गया है मुझे देख जिंदा जला गया है मुझे 1 दफ़्न हर शौक करते-करते अब ""सब्र करना तो आ गया है मुझे ""2 सिलसिला बंदिशों का घर में मेरे इक परिंदा बना गया है मुझे 3 जिंदगी भर जिसे तराशा था देके धोखा चला गया है मुझे 4 इतना…"
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vijay nikore commented on V.M.''vrishty'''s blog post काली स्याही
"कविता अच्छी बनी है। आपको हार्दिक बधाई V.M. Vrishty ji"
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V.M.''vrishty'' commented on V.M.''vrishty'''s blog post जलती मुस्कुराहटें
"आदरणीय बृजेश कुमार जी,सादर अभिनंदन! बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद!"
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V.M.''vrishty'' commented on V.M.''vrishty'''s blog post जलती मुस्कुराहटें
"आदरणीय समर कबीर सर, सादर नमन! आपके स्नेहिल शब्दो के लिए हृदय से आभार!"
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V.M.''vrishty'' commented on V.M.''vrishty'''s blog post जलती मुस्कुराहटें
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी,प्रणाम! बहुत बहुत धन्यवाद!"
Thursday

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City State
U.p
Native Place
Gorakhpur
Profession
Student
About me
Love simplicity

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बरसात

ये नाज़ुक से नगीने-
जिनसे करके श्रृंगार,
इठलाता है,
सदाबहार!
यूँ तो
बहुत शीतल हैं..
मखमली हैं !
पर इन्हें छूते ही,अधरों से,
जिस्म में
आग सी जली है!
ये एहसास कुछ
जाना पहचाना-सा है !
तेरे अधरों की तरह
इनमें भी,,
मयखाना-सा है!

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on October 20, 2018 at 1:06pm

जलती मुस्कुराहटें

कुछ
छिल रहा है!
भीतर-भीतर!
दुख रहा..
नासूर जैसा!!
क्या है ये!
तुम्हारी चुप्पी?
या मेरी उदासी ??
नस-नस में
बेचैनियाँ!
घड़ी-घड़ी घबराहटें !!
क्यों पड़ी हैं आज ?
जलते तवे पर...
रोटियों की जगह-
मेरी मुस्कुराहटें!!

मौलिक व अप्रकाशित

Posted on October 16, 2018 at 9:16pm — 8 Comments

काली स्याही

सजल आँखें,,बोझल मन !
अनुत्तरित प्रश्न ! टूटता बदन !
कुछ फिक्र ! कुछ लाचारी !
कुछ चाही...........,
कुछ अनचाही जिम्मेदारी !
ये कहानी थी कभी शामों की!
पर अब,,न जाने क्यों...
सूरज सर पे चमकता है,
फिर भी रातों का अंधेरा,,
आँखों से नहीं छंटता है ।
मैं लिख रही दास्तान---
बदलते हुए हालात की !
कि अब सफेद सुबहों में,
घुली है............
काली स्याही...रात की....!


मौलिक व अप्रकाशित

Posted on October 15, 2018 at 12:24pm — 9 Comments

मौत की उम्मीद पर (ग़ज़ल)

मौत की उम्मीद पर जीने की आदत हो गयी
जिंदगी सूखे हुए पत्ते की सूरत हो गयी
ठंड ओलों की सही सूरज के अंगारे सहे
पीढ़ियों को पाल कर जर्जर इमारत हो गयी
चेहरा पैमाना बना है खूबियों का आज-कल
रंग गोरा है मगर गुमनाम सीरत हो गयी
धो दिया है तेज़ बारिश ने मकानों को मगर
टूटी फूटी झोंपड़ी वालों की शामत हो गयी
मैं! मेरा उत्कृष्ट सबसे! बाकी सब बेकार है
बस यही समझाने में अब हर जुबाँ रत हो गयी
©vrishty
मौलिक व अप्रकाशित

Posted on October 13, 2018 at 12:34pm — 12 Comments

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