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Amod shrivastav (bindouri)'s Blog – October 2018 Archive (2)

बहुत पछतायेगा वो मेरा पता पा कर - ग़ज़ल

बह्र - 1222-122-2212-22

कोई यूँ खुश हुआ हो अपना खुदा पाकर।।

बहुत पछताएंगे वो मेरा पता पाकर।।

सफर चलना है कैसे ,लेकर चलन कैसा।

उन्हें अहसास होगा ,आबोहवा पाकर।।

वो अपनी ज़द में ही अपना आशियाँ चुन लें ।

कहाँ होता है आदम से बा वफ़ा पाकर।।

मुझे अब मुल्क़ से ये मजहब ही निकालेगा ।

बहुत खुश है मुझे यह जलता हुआ पा कर ।।

मैं अपनी आरजू अब अपना कहूँ कैसे ।

ये तो खुश है मेरे बच्चों से दगा पा कर…

Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on October 18, 2018 at 7:29pm — No Comments

मैं बहुत कुछ सोंचता रहता हूँ पर कहता नहीं

बह्र- 2122-2122-2122-212



ज्यों हवा दस्तक करे खटखट कोई होता नहीं।।

मैं बहुत कुछ सोंचता रहता हूँ पर कहता नहीं।।



इस तरह परछाई सा महसूस होता वो मुझे।

जैसे कोई दरमियाँ अपने है पर दिखता नहीं।।



हर बुढ़ापा रात भर कुछ खोजता है जाने क्या

नींद में भी जागता रहता है क्यों सोता नहीं ।।



चौक में करता नुमाइश ,वक्त भी दल्ला हुआ।

एक झटके में मुझे क्यों नग्न कर देता नहीं।।



इक समंदर कैद है आँखों में अपने दर्द का ।

जो भरा रहता है अंदर,पर… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on October 7, 2018 at 11:06pm — 4 Comments

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