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Sudhir Sharma's Blog – November 2010 Archive (3)

सर्दियाँ

सुबह से चढ़ रहा मुंडेर, गुनगुना सूरज,
शहर में कंपकपाती सर्दियों का फेरा है...

देखता हूँ वो कच्ची धुप में लिपा आँगन,
माँ ने नहलाके खड़ा कर दिया है फर्शी पे..

कान के पीछे लगाया है फ़िक्क्र का टीका....
और पहना दिया है पीला पुलोवर जिसमें..
बुनी है कितनी जागती रातें....

शहर में कंपकपाती सर्दियों का फेरा है,
सुबह से ढूंढ रहा हूँ वो गुनगुना सूरज

Added by Sudhir Sharma on November 29, 2010 at 4:25am — 3 Comments

दस का सिक्का...

`बहुत दिन हुए नहिं देखा दस का सिक्का...



स्कूल के दरवाज़े पर खड़े होकर शांताराम के चने नहीं खाए



बहुत दिन हुए आंगन के चूल्हे पर हाथ तापे..



याद नहीं आखरी बार कब डरे थे अँधेरे से...



कब झूले थे आखरी बार, पेड़ की डाली पर...



कब छोडा था चाँद का पीछा करना..



याद नहीं, कब कह दिया सुनहरी पन्नी वाली चॉकलेट को अलविदा..!!



कहाँ छुट गए कांच की चूडियों के टुकड़े..,



माचिस की डिबिया, चिकने पत्थरों की जागीर..



कब सुना… Continue

Added by Sudhir Sharma on November 14, 2010 at 2:57pm — 5 Comments

वक़्त.

पांच छत्तीस थे...घडी में जब...

शाम की धूप वेंटिलेटर से सरकी थी,

दूर तक साये चले आये थे... बीते मौसम को छोड़ने के लिए....

दर्द बहने लगा था पलकों से,

तुमने आँखों से उतारी थी...आंसुओं की नज़र..

ठंडी काफी में घुल गए थे जाने कितने पहर,

पांच छत्तीस हैं घडी में अब,

शाम की धूप वेंटिलेटर से सरकी है,

वक़्त गुज़रा है मगर,अब तलक नहीं बीता

Added by Sudhir Sharma on November 2, 2010 at 9:03am — 3 Comments

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