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Yogi Saraswat's Blog (5)

प्रेमिकाएं और डाक टिकट

अपनी पुरानी  डायरी में से आपके लिए कुछ हाज़िर कर रहा हूँ ! आशा है आपको पसंद आएगा !



ये प्रेमिकाएं बड़ी विकट  होती हैं

बिल्कुल  डाक टिकट होती हैं

क्योंकि जब ये सन्निकट होती हैं

तो आदमी की नीयत में थोडा सा इजाफा हो जाता है !

मगर जब ये चिपक जाती हैं तो

आदमी बिलकुल लिफाफा हो जाता है !!



सम्बन्धों के पानी से

या भावनाओं की गोंद से चिपकी हुई

जब ये साथ चल पड़ती हैं तो

अपने आप में हिस्ट्री बन जाती हैं !

जिंदगी के डाक खाने में उस लिफ़ाफ़े की

रजिस्ट्री…

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Added by Yogi Saraswat on March 30, 2013 at 10:44am — 16 Comments

क्षणिकाएं

लोकतंत्र

जहाँ हर नेता भ्रष्ट

हर अधिकारी घूस खाने को

स्वतंत्र है |

यही तो अपना

लोकतंत्र है ||



पहचान

लोकसभा और विधानसभा को

बना दिया जंग का मैदान |

देख कर इन नेताओं के कारनामे

लोग हो रहे हैरान ||



उजले कपड़ों के पीछे लिपटे

इंसानों की शक्लों में घूम रहे शैतान |

पचा गए यूरिया , खा गए चारा

बच के रहना मेरे भाई

कहीं खा ना जायें इंसान ||



कहें 'योगी ' कविराय

इन नेताओं से उठा…

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Added by Yogi Saraswat on September 7, 2012 at 2:00pm — 8 Comments

कंक्रीट के वृक्ष

यहाँ वृक्ष हुआ करते थे

जो कभी

लहलहाते थे

चरमराते थे

उनके पत्तों का

आपस का घर्षण

मन को छू लेता था

उनकी डालों की कर्कश

कभी आंधी में

डराती थी मन को  |

बारिश के मौसम की

खुशबू और ताज़गी

कुछ और बढ़ा देती थी

जीवन को  ||



उन वृक्षों की पांत

अब नहीं मिलती

देखने तक को भी

लेकिन , हाँ !

वृक्ष अब भी हैं

वही डिजाईन

वही उंचाई

शायद उंचाई तो कुछ

और भी ज्यादा हो

मगर इनसे…

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Added by Yogi Saraswat on August 21, 2012 at 1:00pm — 20 Comments

ये अंतर क्यों है ?

ओ सर्वव्यापी , ओ सर्वशक्तिमान

जब सब में है तू विद्यमान

तो इस दुनियाँ में ये

ऊँच-नीच का अंतर क्यों है ?



कोई कहे तुझे खुदा , कोई कहे तुझे भगवान्

करते जब सब तेरा ही गुणगान

तो इस मृत्युलोक  में

तेरे नाम में ये अंतर क्यों है ?



ओ सर्वरक्षक , सर्वगुणों की खान

कैसा है तेरा विधान

जब सब तेरे बनाये हुए हैं

तो ये गोरे काले का अंतर क्यों है ?



तू है सबका प्यारा , तू है सबसे महान

कोई पढ़े गीता यहाँ , कोई पढ़े कुरआन…

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Added by Yogi Saraswat on June 29, 2012 at 10:00am — 10 Comments

वृक्ष

हरे भरे ये वृक्ष हमारे

 देते ठंडी ठंडी छांव |

सबको जरूरत रहती इनकी

 नगर हो या हो गाँव  ||…

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Added by Yogi Saraswat on May 14, 2012 at 3:31pm — 22 Comments

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