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प्रेमिकाएं और डाक टिकट

अपनी पुरानी  डायरी में से आपके लिए कुछ हाज़िर कर रहा हूँ ! आशा है आपको पसंद आएगा !

ये प्रेमिकाएं बड़ी विकट  होती हैं
बिल्कुल  डाक टिकट होती हैं
क्योंकि जब ये सन्निकट होती हैं
तो आदमी की नीयत में थोडा सा इजाफा हो जाता है !
मगर जब ये चिपक जाती हैं तो
आदमी बिलकुल लिफाफा हो जाता है !!

सम्बन्धों के पानी से
या भावनाओं की गोंद से चिपकी हुई
जब ये साथ चल पड़ती हैं तो
अपने आप में हिस्ट्री बन जाती हैं !
जिंदगी के डाक खाने में उस लिफ़ाफ़े की
रजिस्ट्री बन जाती हैं  !!

यूँ इनके साथ होने पर
लिफ़ाफ़े का अपना एक रंग होता है !
मगर जब ये नहीं होती हैं तो
लिफाफा बेरंग होता है !!

मेरी आप लोगों से विनती है , अरदास है , रिक्वेस्ट है
कि आप अपनी जिंदगी के लिफ़ाफ़े पर
किसी भी मूल्य का , किसी भी साइज़ या आकार का
डाक टिकट चिपकाइए ! मगर
ज़रा सलीके से लगाइये !!

कहीं ऐसा न हो इससे कहीं कोई
दुर्घटना घट  जाए !
और कोई आपके लिफ़ाफ़े का डाक टिकट छुडाने लगे तो
कहीं लिफाफा ही न फट जाए  !!

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Comment

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Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:31am

आदरणीया डॉ. प्राची सिंह  जी , सादर अभिवादन ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद और समर्थन मिला , बहुत बहुत आभार ! आपकी उत्साहित करती प्रतिक्रिया से दिल प्रसन्न हो गया ! संवाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:30am

आदरणीय श्री संदीप  जी , सादर ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद और समर्थन मिला , बहुत बहुत आभार ! संवाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:29am

आदरणीय श्री लक्ष्मन प्रसाद  जी , सादर ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद और समर्थन मिला , बहुत बहुत आभार ! संवाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:28am

आदरणीया सावित्री राठोर  जी , सादर ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद और समर्थन मिला , बहुत बहुत आभार ! संवाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:27am

आदरणीया कुंती मुकर्जी  जी , सादर ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद और समर्थन मिला , बहुत बहुत आभार ! संवाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:26am

आदरणीय श्री जवाहर सिंह जी , सादर ! मेरे शब्दों को आपका आशीर्वाद और समर्थन मिला , बहुत बहुत आभार ! संवाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:24am

आदरणीय श्री सौरभ पाण्डेय जी , सादर ! मैं साहित्य का बहुत ज्यादा तकनीकी ज्ञान नहीं रखता , आप के आशीर्वाद से कुछ लिख लेता हूँ ! इसलिए आशा करता हूँ आपका मार्गदर्शन मुझे अपने आप को मांजने में सहायक सिद्ध होगा ! बहुत बहुत आभार आपका !

Comment by Yogi Saraswat on April 2, 2013 at 11:19am

मेरे  शब्दों को आशीर्वाद देने के लिए आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय राजेश कुमारी जी ! संवाद बनाये रखियेगा ! धन्यवाद


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 31, 2013 at 9:23am

यूँ इनके साथ होने पर
लिफ़ाफ़े का अपना एक रंग होता है !
मगर जब ये नहीं होती हैं तो
लिफाफा बेरंग होता है !!-----इन पंक्तियों के लिए पूरे नंबर बहुत मजा आया ये हास्य रचना पढ़कर नासमझो के लिए सीख भी है बहुत-बहुत बधाई


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 31, 2013 at 6:02am

भाई योगी सारस्वत जी, इस हास्य प्रधान रचना के लिए मेरी भूरि-भूरि बधाइयाँ स्वीकार करें. पहले बंद से ही आपकी यह कविता पाठक के मन को बाँध लेती है.

इस तरह की कविताओं की आत्मा शब्द-संचयन के साथ-साथ सटीक शब्दों के संयमित प्रयोग हुआ करती है. मेरे कहे का बहुत ही सुन्दर उदाहरण इसी कविता का प्रारम्भ है. आखिर के बंदों में रचना की नैसर्गिक सहजता अति आत्मविश्वास  --इस कारण हुई शाब्दिकता--  से थोड़ी असहज सी हुई प्रतीत है, लेकिन तबतक रचना ही समाप्त हो जाती है.

एक सफल हास्य रचना के लिए अतिशय बधाइयाँ.

सादर

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