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Mamta 's Blog (6)

लघुकथा "मजबूरियाँ"

म्याऊँ -म्याऊँ बहुत देर से एक करुण पुकार कानों में सुन कर अम्माँ खीज कर बोलीं ,अरी गिन्नी ,"ज़रा बाहर जाकर देखियो ये कौन सी चुड़ैल बिल्ली चिल्ला रही है ? मरी को डंडा मार के भगा दे ....। "अरे अम्माँ जी ये तो वही है जिसने कल ही छत पर पाँच सुंदर से बच्चे दिए हैं बिचारी भूखी है शायद ...",गिन्नी लगभग चीख़ती सी बोली । बिल्ली की प्रसवपीडा के बाद की स्थिति को सोच वह विह्वल हो उठी थी । अंदर आ अम्माँ से फिर बोली ,"अम्माँ इसे कुछ खाने को दे दूँ ,ज़रा पेट तो देखो काली नदी के किनारों की तरह सिमट कर मिल रहा… Continue

Added by Mamta on August 19, 2017 at 1:08pm — 7 Comments

तलवार (लघुकथा)

जैसे ही कई वर्ष पुरानी तलवार को उस वीर ने म्यान से बाहर खींचा तैसे ही उस जंग लगी तलवार के सोये अरमान फिर से जाग उठेऔर उसने चाहा कि उसे फिर एक बार पहले सा सम्मान,प्रेम प्राप्त हो जो पहले उसे राजा के हाथ में आने के बाद मिलता था। उसे याद हो आये वो दिन जब युद्ध में सिपाहियों को पाट पाट कर वो अचानक ही अपने राजा की प्रधान प्रेयसी बन जाती थी। उसके मुख पर एक कुटिल मुस्कुराहट छाई व मन में एक आकांक्षा जागी वही युद्ध, वही सम्मान! काश ! वीर ने उसे बुझे मन से देखा व सान धरने वाले के पास ले गया। उसने…

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Added by Mamta on January 8, 2016 at 10:30am — 11 Comments

गीत

नये साल की भोली शिशु सम ,

मधुर निराली भोर

प्यारी व चित चोर।



सुबह सवेरे पंछी जगते,

अलसाई गति से पग धरते

नापें गगन का छोर।

मधुर निराली भोर,

प्यारी व चित चोर।



अँखियाँ काजल वारी कारी

बरसावें मधु कभी दें गारी,

चमकें नई नकोर।

मधुर निराली भोर,

प्यारी व चित चोर।



मनहर दिन मदमाती रातें

मधुकर की मनमोहक बातें,

कलियाँ हुईं विभोर

मधुर निराली भोर,

प्यारी व चित चोर।



ओस लपेटे भीगी गात लिए,

सतर… Continue

Added by Mamta on January 1, 2016 at 4:01pm — 8 Comments

कविता "परेशानी"

सोच रही हूँ आज कौन सा गीत लिखूँ जी

आडी -तिरछी रेखाओं में भाव भरूँ जी।



मन उड़ भागा लेकर भाव के सारे पन्ने।

दिक करते हैं बोल पडौस में गव रहे बन्ने।



कभी किसी कोयलिया ने कुहु टेर लगाई ।

खुशबू पहले बौर की मुझ तक दौड़ी आई।



डाल पे झूले बैठीं सखियाँ झूल रही हैं।

मन की चिड़िया शब्द भी सारे भूल रही है।



काला कौवा बैठ मुंडेरी चीख रहा है।

आता दूर पथिक भी कोई दीख रहा है।



रात चाँदनी साज लिए लो बैंठ गई है ।

नई बहुरिया सास से…

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Added by Mamta on August 19, 2015 at 3:30pm — 5 Comments

बोध (लघुकथा)

फैंसी ड्रैस का आयोजन था।वृद्धाश्रम के सभी वृद्ध तरह - तरह की वेशभूषा में सजे थे। कोई किसान,कोई सब्जी बेचने वाला,कोई पुजारी ,कोई माली तो कोई संत।

उन्हीं में से एक वृद्धा ने कटोरा हाथ में लिया व अपनी वेशभूषा के अनुरूप वह भीख माँगने लगी।

फैंसी ड्रेस का माहौल ही बदल गया। सबके हाथ पीछे हट गए,आँखे पनीली हो गईं,ह्रदय करूण भाव से भर गया ।सभी के मन के एक कोने में एक पछतावा, एक पश्चाताप सा जाग गया।सब यही सोच रहे थे ओह! ये हमने क्या कर दिया।सबकी संवेदना ने विचारों पर ताला लगा दिया ये दृश्य…

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Added by Mamta on August 13, 2015 at 5:30pm — 8 Comments

मोमबत्तियाँ (लघुकथा)

सीले हुए ,पुराने अधखुले तुडेमुडे गत्ते के डिब्बों में बन्द मोमबत्तियाों को दुकानदार ने झींकते हुए बार निकाला और मन ही मन जाने क्या-क्या खुदबखुद बडबडाने लगा । उसे ऐसे परेशान होता देख खुले डब्बे के मुँह से झाँककर एक मोमबत्ती बोली,'बेचारा!' फटाक से दूसरी बोली,'क्यों तुम्हें अपने ऊपर तरस नहीं आता ! कभी सोचा भी है कि कितने साल हो गए हमें इस मौसम में बाहर आते और मौसम खत्म होने पर बिना बिके अन्दर जाते।' नहीं याद वे दिन जब हमारी ज़रूरत बहुत थी, शान बहुत थी। हर दिन हमारा प्रयोग हुआ करता था और हम कभी…

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Added by Mamta on August 12, 2015 at 9:30am — 15 Comments

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