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Venus's Blog (4)

मैं और आगे बढ़ते जाती हूँ

दिन-प्रतिदिन स्वयं में ही ध्वस्त हो

विच्छेद हो कण-कण में बिखर जाती हूँ

आहत मन,थका तन समेटे दुःसाध्यता से…

Continue

Added by Venus on March 8, 2011 at 5:30pm — 3 Comments

सैर फरवरी की धूप में

फरवरी की धूप में

बिखरे -२ से रूप में

चल रही थी मौज में

मीठी मीठी सी धूप में…

Continue

Added by Venus on February 8, 2011 at 5:00pm — 1 Comment

लम्स की तपिश

बस इक बार ही चखा था मैंने उठा के

तुम्हारा लम्स अपने ठंडी रूह से लेकिन

बरसों सुलगता रहा वो हिस्सा रूह में

इक चिंगारी की तरह पकiता रहा रूह को

बस इक लम्स की तपिश से जीती रही

चखती रहती रूह उस चिंगारी को धीरे-२

ज्यूँ- ज्यूँ मेरी रूह का दायरा बढ़ता गया

चिंगारी चखने की आदत बढती गयी

पर वक़्त के साथ मधम हो गयी है… Continue

Added by Venus on November 16, 2010 at 12:30am — 5 Comments

रात ना कटे तो तुम ऐसा करना ....

रात ना कटे तो तुम ऐसा करना ..

काली लम्बी इस रात के 3 टुकड़े करना



इक टुकडा काट के आसमान को दे देना



फिर दूसरा टुकडा दे देना तुम चाँद को

बचा हुया वो एक आखिरी टुकडा



तुम अपने पास अपने सरहाने रख लेना,



लेटे लेटे उसमे देखना बीता वक़्त हमारा

वो मिलना ,वो जीना,वो बिछड़ना हमारा

इस लम्बे से सफ़र में वो छोटा… Continue

Added by Venus on November 16, 2010 at 12:30am — 7 Comments

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"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
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लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
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