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बस इक बार ही चखा था मैंने उठा के
तुम्हारा लम्स अपने ठंडी रूह से लेकिन
बरसों सुलगता रहा वो हिस्सा रूह में
इक चिंगारी की तरह पकiता रहा रूह को
बस इक लम्स की तपिश से जीती रही
चखती रहती रूह उस चिंगारी को धीरे-२
ज्यूँ- ज्यूँ मेरी रूह का दायरा बढ़ता गया
चिंगारी चखने की आदत बढती गयी
पर वक़्त के साथ मधम हो गयी है तपिश
अब दायरा और फैलने लगा है रूह का
और साथ ही बढने लगी है इसकी ठंडक

.....बस कभी आके इक बार फिर से
जरा सा चखा जाना रूह को अपना लम्स
..............कुछ साल और...जी लेगी बेचारी....
तुम्हारे इक लम्स की तपिश में ..........!

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Comment

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Comment by Venus on February 3, 2011 at 5:35pm

आप सब का बहुत बहुत शुर्किया ..समय की कमी ..और अन्य व्यस्तताओं के कार्न मे आ न्ही पा र्ही हूँ..आप सब के क्मैंनेट्स ने बहुत हौंसला दिया..आप सब का तह ए दिल से शुर्किया

Take care

Comment by आशीष यादव on November 17, 2010 at 7:42am
विरह अग्नि में जलती एक आत्मा की आवाज को उजागर करती यह उत्तम रचना| पढ़ कर अच्छा लगा|
Comment by विवेक मिश्र on November 17, 2010 at 12:04am
OBO में आपका हार्दिक स्वागत है वीनस जी. आपकी रचनाओं को मैं पहले भी पढ़ता रहा हूँ और आपके गुलज़ार-प्रेम से भी वाकिफ हूँ. अभी-२ ये नज़्म भी पढ़ ली. पहली लाइन ही दिल छू लेती है और बार-२ दोहराने को जी करता है.

"बस इक बार ही चखा था मैंने उठा के
तुम्हारा लम्स अपने ठंडी रूह से"

गज़ब की अभिव्यक्ति है. हार्दिक बधाई.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 16, 2010 at 10:04pm
बहुत ही संजीदा और खूबसूरत नज़्म|

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 16, 2010 at 8:11pm
आदरणीया वीनस जी, बहुत ही सुंदर कविता आपने प्रस्तुत किया है, खास बात यह है कि इस कविता का कलेवर कुछ अलग तरह का लगा, सुंदर कविता , खुबसूरत भाव हेतु बधाई स्वीकार कीजिये |

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