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प्रेमियों केे प्रेम केे निशान बन गए

मिलते वहीँ थे घाट पे करते थे गुफ़्तगू
तेरे बगैर घाट भी वीरान बन गए

उस पार रेत से जो हमने घर बनाए थे
वो प्रेमियों केे प्रेम केे निशान बन गए

अक्सर बिताईं शामें हमने विश्वनाथ में
अब पूजते हैं उनको वो भगवान् बन गए

चर्चे हमारे इश्क़ के गलियों में खूब थे
ख़बरों में थे कभी अभी गुमनाम बन गए

किस मोड़ पर ये इश्क़ हमको लेके आ गया
जलकर तुम्हारे प्यार में शमशान बन

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on June 12, 2020 at 6:43pm

जनाब विनय प्रकाश तिवारी जी, बह्र,शिल्प,व्याकरण पर अभी आपको बहुत मिहनत करना है,अध्यन करें,इस प्रयास पर बधाई ।

Comment by Vinay Prakash Tiwari (VP) on June 11, 2020 at 8:30pm

आदरणीय मोहतरमा डिंपल शर्मा जी आपका तहे दिल से शुक्रिया

Comment by Vinay Prakash Tiwari (VP) on June 11, 2020 at 8:29pm

ज़नाब अमीरुद्दीन 'अमीर' साहब तहे दिल से शुक्रिया आपका, आपसे निवेदन रहेगा खामियों को उजागर करते रहे आप फलस्वरूप हम सीखते रहे

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on June 11, 2020 at 12:27pm

जनाब विनय प्रकाश तिवारी जी, आदाब। अच्छी कविता ( नज़्म ) कही है आपने। बधाई स्वीकार करें। 

Comment by Dimple Sharma on June 11, 2020 at 11:13am

अहा आदरणीय बहुत ख़ूब, शमशान बन गए, ग़ज़ल उम्दा हुई बधाई आपको ।

Comment by Vinay Prakash Tiwari (VP) on June 10, 2020 at 6:33pm

ज़नाब रविकर साहब आपका बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by रविकर on June 10, 2020 at 1:38pm

सुंदर रचना है मित्रवर

कृपया ध्यान दे...

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