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गेहूँ रहा अलीक न यूँ ही गुलाब से

२२१/२१२१/१२२१/२१२


मारा करे हैं  लोग  जो गम को शराब से
लाते खुशी को देखिए कितने हिसाब से।१।
**
खुशबू है भारी भूख पे सुनते जहान में
गेहूँ रहा  अलीक  न  यूँ  ही  गुलाब से।२।
**
लाता नहीं है होश भी अपने ही साथ क्यों
शिकवा है हमको एक ही यारो शबाब से।३।
**
साधी है हमने यूँ नहीं हर एक तिश्नगी
गुजरा है अपना दौर भी यारो सराब से।४।
**
उनको तो कुर्सी चाहिए पापों की नींव पर
मतलब न रखते आज भी सेवक सवाब से।५।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on June 29, 2020 at 9:24am

आ. भाई समर जी, सादर अभिवादन । गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by Samar kabeer on June 10, 2020 at 12:15pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

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