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भोर सुख की निर्धनों ने पर कहीं देखी नहीं -लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२२/२१२
*
जब कोई दीवानगी  ही  आप ने पाली नहीं
जान लो ये जिन्दगी भी जिन्दगी सोची नहीं।।
*
पात टूटे  दूब  सूखी   ठूठ  जैसे  हैं  विटप
शेष धरती का कहीं भी रंग अब धानी नहीं।।
*
भर रहे हैं सब हवा में आग जब देखो सनम
फूल होगा याद  में  बस  गन्ध  तो होगी नहीं।।
*
तैरती है प्यास आँखों में सभी के रक्त की
हो गये हैं  लोग  दानव  पी  रहे पानी नहीं।।
*
राजशाही  साम्यवादी  लोकशाही  दौर  सब
भोर सुख की निर्धनों ने पर कहीं देखी नहीं।।
*
हर भयानक स्वप्न केवल स्वप्न ही बनकर रहे
दुख नहीं इसका भले ही घर खुशी आयी नहीं।।

मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर'

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 5, 2022 at 8:57pm

आ. भाई गुमनाम जी, सादर अभिवादन। गजल पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by gumnaam pithoragarhi on July 5, 2022 at 5:56pm

वाह अच्छा है मुसाफिर साहब ॥ वाह 

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