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बोल मेरे अर्पण

तुझको क्‍या लुभाए

डैनें बांध रहना

या उड़ना जग उठाए

मूड़ता जो माथा

है वह अनादि गाथा

आवर्त की ये रूनझुन

पथ में सभी ने पाए

रोहित न हो तू लोहित

आकर है तू तो शोभित

स्‍वर दे जरा गमक दे

अनहद तुझे बुलाए

इक दृष्टि अपलक दे

सोंधी सी इक धमक दे

यह चक्र जो अनघ है

सबको ही आजमाए

नीरव निशा जो रहती

श्‍यामल सी चोट सहती

भासित उसी से सूरज

चलता है पग छिपाए

तो चल ना भूल पथ अब

तपी हो ना तू विरत अब

होता वही है दुष्‍कर

जिसको तू सिर झुकाए

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 1, 2013 at 12:02pm
भाई राजेश जी, क्षमा करना, मेरे भाई इस नाम राकेश है, वाही लिखने में आ जाता है।
अक्सर गूगल ट्रांसलेट करते समय नाम सामने न रहने के कारण भी । मै आपको 
भाई के रूप में अनुज और साहित्य में आदरणीय मान कर चलता हूँ । आपकी माताजी 
का द्वारा संबोधित नाम हे श्रेष्ठ है, और उसी नाम से संबोधित करने का प्रयास रहेगा । 
अपकार स्नेहिल -लक्ष्मण 
Comment by राजेश 'मृदु' on March 1, 2013 at 11:26am

हार्दिक आभार आदरणीय लड़ीवाला जी एवं राम शिरोमणि जी । लड़ीवाला जी मैं राजेश हूं ना कि राकेश, इससे पहले भी आप मुझे यही नाम दे चुके हैं, अगर आपको यही पसंद है तो यही सही पर माताजी का दिया मेरा नाम शायद मुझे अधिक खुशी देगा, सादर

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on February 27, 2013 at 11:16am

रोहित न हो तू लोहित

आकर है तू तो शोभित

स्‍वर दे जरा गमक दे

 अनहद तुझे बुलाए।

बोल मेरे अर्पण

तुझको क्‍या लुभाए-------बहुत सुन्दर भाव, हार्दिक बधाई राकेश कुमार झा जी 

स्वर ही तुझे लुभाए 

अनहद तुझे बुलाए।------अर्पण ये बोले - लक्ष्मण ये समझे रकेश जी 

Comment by ram shiromani pathak on February 26, 2013 at 8:12pm

नीरव निशा जो रहती

श्‍यामल सी चोट सहती

भासित उसी से सूरज

चलता है पग छिपाए!!

उत्तम अति उत्तम भाई जी .........हार्दिक बधाई 

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