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अभिचार सा

करता

छिड़कता जल

चला था,

शून्‍य पथ

धर अफीमी

रूप कोई

रात थी

बेहद सुरत

कुछ धुरंधर

मेघ भी तो

कर गए

नि:शब्‍द ही

गलफड़े भर

श्‍वांस भरके

थे खड़े

कुछ दर्द भी

ढह ना पाई

रोशनी पर

ना हुई

पथ से विपथ

करबले की

ओर बढ़ते

पांवों में थी

जो शपथ

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Comment

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Comment by Yogi Saraswat on March 2, 2013 at 11:38am

मेघ भी तो

कर गए

नि:शब्‍द ही

गलफड़े भर

श्‍वांस भरके

थे खड़े

कुछ दर्द भी

ढह ना पाई

रोशनी पर

ना हुई

पथ से विपथ

करबले की

ओर बढ़ते

पांवों में थी

जो शप

bahut sundar shabd jha ji

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 1, 2013 at 10:43pm

वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह क्या बात है सुन्दर,,,,,,,,,,,बधाई,,,,,,,,,,,,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 1, 2013 at 10:12pm

धर अफीमी

रूप कोई

रात थी

बेहद सुरत

कुछ धुरंधर

मेघ भी तो

कर गए

नि:शब्‍द ही

गलफड़े भर

श्‍वांस भरके

थे खड़े

कुछ दर्द भी---बहुत सुंदर सजीव चित्र सा खींच दिया आंखों के समक्ष सुंदर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई| 

Comment by रविकर on March 1, 2013 at 3:42pm

यह तो अच्छी लयबद्ध रचना है आदरणीय-
सुन्दर भाव-
आभार

Comment by Meena Pathak on March 1, 2013 at 2:05pm

बहुत उम्दा ... बधाई राजेश जी 

Comment by राजेश 'मृदु' on March 1, 2013 at 11:10am

हार्दिक आभार डॉ0 खरे साहब, राम शिरोमणि जी एवं आदरणीय पवन अंबा जी

Comment by Dr.Ajay Khare on March 1, 2013 at 11:03am

sunder rachna badhai

Comment by ram shiromani pathak on February 28, 2013 at 7:22pm

अभिचार सा

करता

छिड़कता जल

चला था,

शून्‍य पथ

धर अफीमी

रूप कोई

रात थी!!!!!!!

kyaa baat hai bhai ji .........bahot badiya

Comment by pawan amba on February 28, 2013 at 6:27pm

पथ से विपथ

करबले की

ओर बढ़ते

पांवों में थी

जो शपथ....sundar abhivaykti....

कृपया ध्यान दे...

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