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अहसास की ग़ज़ल :मनोज अहसास

22  22  22  22

रोज नए ढंग की उलझन है
सुलझाने का पूरा मन है

सबपे भारी बीसवाँ सन है
बच जाने का रोज जतन है

मेरे गीतों में ग़ज़लों में
तेरी यादों की कतरन है

मानव की ताकत की हक़ीक़त
गलियों का ये सूनापन है

सालों पहली कुछ बातों से
अब तक सीने में तड़पन है

मुझको जो उनसे कहना है
उनकी नज़र में पागलपन है

असली चेहरा ढक रक्खा है
सब चीजों पे रंग रोगन है

इन मिसरों के हर अक्षर में
मेरा सारा जीवन धन है

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Manoj kumar Ahsaas on June 29, 2020 at 11:18am

हार्दिक आभार आदरणीय

आगे से बेहतर प्रयास का प्रयास रहेगा

Comment by Samar kabeer on June 24, 2020 at 2:32pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,लेकिन इसमें ग़ज़लियत नहीं है,मिसरों में जैसे तैसे मात्राएँ पूरी की गई हैं, बधाई स्वीकार करें ।

'मानव की ताकत की हक़ीक़त'

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