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फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन

ज़िन्दगी में सिर्फ़ ग़म हैं और तुम हो
आज फिर से आँखें नम हैं और तुम हो

लग रहा है अब मिलन संभव नहीं है
वक़्त से लाचार हम हैं और तुम हो

रात चुप, है चाँद तन्हा, साँस मद्धम
इश्क़ में लाखों सितम हैं और तुम हो

दिल की बस्ती में अकेला तो नहीं हूँ
नींद से बोझिल क़दम हैं और तुम हो

क्या बताऊँ किसलिये है 'ब्रज' परेशां
वस्ल के आसार कम हैं और तुम हो

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on February 19, 2021 at 5:26pm

बहुत खूब,ग़ज़ल हुई है हार्दिक बधाई भाई  बृजेश जी।

Comment by Aazi Tamaam on February 19, 2021 at 9:42am

आदरणीय जनाब ब्रजेश जी बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल है

और तुम हो........ बेहतरीन

बधाई स्वीकार करें

कृपया ध्यान दे...

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