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अहसास की ग़ज़ल-मनोज अहसास

221   2121   1221   212

आएगा जब तलक नहीं मौसम गुलाब का,
बदला रहेगा मूड मेरे आफताब का।

मज़बूरियों में जल गई इक उम्र की वफ़ा,
उसने दिखाया मुझको सलीका नकाब का।

मैं ऐसी शाइरी की तमन्ना में कैद हूँ ,
इक शेर में जो कह दे फसाना किताब का।

वो बेहिसाब बातों से भर देंगे सबका पेट,
जिनको समझ रहा है तू पक्का हिसाब का।

तासीर क्या है होठों से छूकर पता करो,
इक जाम ही बहुत है सुखन या शराब का।

बरसों पुरानी बातों पे अब खाक डाल दे,
मज़मून खुद ही सोच ले उनके जवाब का।

सागर सी ये हयात है कतरे सा तेरा इश्क,
दिल को मिटा भी सकता है जीना सराब का।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by मनोज अहसास on February 12, 2020 at 9:58pm

हार्दिक आभार आदरणीय

सादर

Comment by Samar kabeer on February 12, 2020 at 3:15pm

जनाब मनोज अहसास जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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