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किसी को कुछ नहीं होता

किसी को कुछ नहीं होता

तोता पंखी किरणों में
घिर कर
गिर कर
फिर से उठ कर
जो दिवाकर से दृष्ष्टि मिलाई
तो पलक को स्थिती समझ नहीं आयी

ऐसा ही होता है प्राय
मन ही खोता है प्राय
बाकी किसी को कुछ नहीं होता
किसी को भी


प्रचंड की आँख में झांकना
कोई दृष्टता है क्या

केवल मन उठता है
प्रश्न प्रश्न उठाता है
लावे की लावे से
मुलाकात कराता है

तोता पंखी किरणों में हो
अथवा दुपहराती प्रचंडता में
मन ही खोता है प्राय
बाकी किसी को कुछ नहीं होता

....

मौलिक एव  अप्रकाशित

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 4, 2020 at 7:21am

आ. अमिता जी, अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on March 3, 2020 at 2:21pm

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब, अच्छी रचना हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

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