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आज आंखें नम हुईंं तो क्या हुआ
रो न पाए हम कभी अर्सा हुआ

आपबीती क्या सुनाऊंगा उसे
आज भी तो है गला बैठा हुआ

ढूंढता हूँ इक सितारे को यहाँ
दूर तक है आसमां फैला हुआ

क्यों  क़रीने से रखें सामान को
घर को रहने दीजिये बिखरा हुआ

नींद  पलकों  पर  कहीं ठहरी हुई
ख़्वाब आंखों में वहीं सहमा हुआ

जी  रहा  हूँ  बस  इसी उम्मीद से
लौट  आएगा  समय  बीता हुआ

हादसे  ऐसे   भी  तो   होते   रहे
जो  नहीं  बोया   वही पैदा हुआ

2122 2122 212

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सालिक गणवीर on April 6, 2020 at 8:13pm
सर जी,
बहुत शुक्रिया, नवाज़िशें.
Comment by Samar kabeer on April 6, 2020 at 7:31pm

'नींद पलकों पर कहीं ठहरी हुई'

ये मिसरा ठीक है ।

//एक बार पोस्ट करने के बाद करेक्शन कैसे करूँ?//

ग़ज़ल के साथ एडिट करने का ऑप्शन है,जब आप एडिट कर देंगे तो फिर से अप्रूवल के लिए जाएगी,कुछ देर में अप्रूव हो जाएगी ।

Comment by सालिक गणवीर on April 6, 2020 at 7:03pm
आदरणीय कबीर साहब
आदाब
बहुत शुक्रिया आपका,जो समय निकालकर ज़रूरी सुझाव दिए.अमल भी कर लिया. नींद वाला मिसरा भी बदल कर लिखा है....
नींद पलकों पर कहीं ठहरी हुई
2122 2122 212
एक बार पोस्ट करने के बाद करेक्शन कैसे करूँ? कुछ सूझ नहीं रहा है. कृपया मार्ग दर्शन करें.
सदैव आभार सहित
सालिक गणवीर
Comment by Samar kabeer on April 6, 2020 at 5:10pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'आज आंखें नम हुई तो क्या हुआ'

इस मिसरे में 'हुई' को "हुईं" कर लें ।

दूर तक है आसमां फैला हुआ

'क्यों करीने से रखें सामान को'

इस मिसरे में 'करीने' को "क़रीने" कर लें ।

'नींद सिरहाने पर है ठहरी हुई'

इस मिसरे में 'सिरहाने' का वज़्न आपने 222 लेकर अंतिम गुरु को लघु लिया है,जबकि 'सिरहाने' को लिखा ऐसे जाता है पर इसका वज़्न "सिराने'122 लिया जाता है,इसे बदलने का प्रयास करें ।

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