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मातृ -महक
 
माँ बहुत स्वार्थी होती है
यह बात मुझे कभी समझ नहीं आती थी कि
मै समझदार जिम्मेदार क्यों नहीं हो पाती थी
सर्वदा सुरक्षित सर्वदा आरक्षित
जब तक माँ रही
 
माँ सचमुच बहुत स्वार्थी होती है
वह कभी नहीं बताती कि
कैसे वह एक अलग सी खुशबू से
पूरे घर को नहला देती थी
पावनता से बहला देती थी
कहाँ से कौन सी धूप बत्ती मँगवा लेती थी
कैसे सब बिगडों से संध्या करवा लेती थी
वह कभी नहीं बताती कि
कैसे वह एक अलग सी खुशबू से
पूरे घर को नहला देती थी
 
माँ बहुत स्वार्थी होती है
वह कभी नहीं बताती कि कैसे
कभी नहीं पूछती पसंद नापसंद
बिन पूछे सबके मन का पकवा देती थी
पलक झपकते हो आती थी ऊपर नीचे
घुटनो को सहलाने वाली माँ
तब इतनी फुर्ती कहाँ से ला पाती थी
 
 अब जब माँ नहीं रही
तो मुझे ही यकीन नहीं आता
मै इतना बदला हुआ किरदार हो गई हूँ
इतनी इतनी स्वत ही समझदार हो गई हूँ
कि अब जब माँ नहीं रही
तो डंके की चोट पर कहती हूँ
कि माँ बहुत स्वार्थी होती है
 
माँ बहुत स्वार्थी होती है
वह कभी नहीं बताती
और मैं भी कहाँ जान पाती
कभी नहीं समझ पायी वो सुर ,वो सुगंध
माँ के साथ की थी या माँ के हाथ की थी
कभी नहीं जान पायी
सारे धूप अगरबत्ती परख परख के देख लिए
कि वो महक,महज़ माँ के होने के एहसास की थी
 
सच है तो बस इतना कि सब मांएं होती है खुशबू
औलाद ही होती है जो समझने मे भूल कर जाती है
बाज़ारों मे खोजती फिरती है सुगंध
वो महक जो महज़ माँ से छलक पाती है
माँ बहुत स्वार्थी होती है
वह कभी यह नहीं बताती है
........................................
"मौलिक व अप्रकाशित" 
..........................................................

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Comment

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Comment by amita tiwari on May 16, 2020 at 12:01am

जनाब समीर साहब

बेहद शुक्रिया  

Comment by Samar kabeer on May 15, 2020 at 7:41pm

मुहतरमा अमिता तिवारी जी आदाब, अच्छी रचना हुई है, बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

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