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मंत्री का कुत्ता - लघुकथा -

मंत्री का कुत्ता - लघुकथा -

मेवाराम अपने बेटे की शादी का कार्ड देने मंत्री शोभाराम जी की कोठी पहुंचा। दोनों ही जाति भाई थे तथा रिश्तेदार भी थे। मेवाराम यह देख कर चौंक गया कि मंत्री जी के बरामदे में शुक्ला जी का पालतू कुत्ता बंधा हुआ था।अचंभे की बात यह थी कि शुक्ला और मंत्री जी एक ही पार्टी में होते हुए भी दोनों  एक दूसरे के कट्टर विरोधी थे।

मेवाराम को यह बात हज़म नहीं हुई। उसके पेट में गुड़्गुड़ होने लगी।इस राज को जानने को वह  उतावला सा हो गया।

आखिरकार चलते चलते उसने मंत्री जी का मन टटोलने की ठान ली,"भाई जी ऐसा लगे है कि यह कुत्ता शुक्ला जी का है?"

मंत्री जी भी पूरे घाघ निकले,"क्यूं भाई, इस पर शुक्ला का नाम छपा है क्या?"

"मैंने उसके छोरे को इसे घुमाते देखा था।"

"देख भाई मेवाराम, आजकल के कुत्ते अब पहले जैसे वफ़ादार नहीं रहे।जो भी उसे बढिया खिलाता है, उसी के लिये दुम हिलाते हैं और भौंकते हैं।"

"बात कुछ पल्ले नहीं पड़ी?"

"शुक्ला उसे दूध रोटी देता था  और हम उसे गोस्त खिलाते हैं।"

"लेकिन भाई जी इसके बावजूद भी वह आपके लिये दुम नहीं हिलाये और नहीं भौंके तो?"

"तो साले को गोली मरवा देंगे।"

मौलिक, अप्रकाशित एवम अप्रसारित।

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Comment by TEJ VEER SINGH on July 20, 2020 at 6:17pm

हार्दिक आभार आदरणीय सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी।

Comment by नाथ सोनांचली on July 18, 2020 at 4:32pm

आद0 तेजवीर सिंह जी सादर अभिवादन। बढ़िया समसामयिक व्यंग्य है आदरणीय । बहूत खूब। बधाई स्वीकार कीजिये, इस लघुकथा पर।

Comment by TEJ VEER SINGH on July 16, 2020 at 9:24am

हार्दिक आभार आदरणीय  लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' जी।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on July 16, 2020 at 6:44am

आ. भाई तेजवीर जी, सादर अभिवादन । अच्छी लघुकथा हुई है । हार्दिक बधाई ।

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