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22 22 22 22 

कैसा अक्कड़ बक्कड़ है दिल..

पा के तुझको अक्खड़ है दिल..

सपने देखे, ऐसे वैसे..

रब्बा जाने कैसे कैसे..

उड़ता फिरे ये बैठे बैठे..

चाहे मिलना जैसे तैसे..

फिरते फ़क़ीर सा फक्कड़ है दिल।

उठते ही जालिम ये सबेरे..

हाथ पैर ये जोड़े मेरे..

चल कर आयें, घर के फेरे..

चिपका गली से, जैसे तेरे..

मोहल्ले का, नुक्कड़ है दिल।

चाहे, तुझसे बातें ये करे..

हाँ रोज़ मुलाकातें ये करे..

कुछ ऐसी करामातें ये करे..

साथ में दिन अर रातें ये करे..

तेरी तलब का, भुख्खड़ है दिल.।

प्यार से पहले की नफरतों का..

ढीढ सी तेरी फितरतों का..

बाहों में कसती कसरतों का..

आँखों में हँसती हसरतों का..

हाय! अजीब पियक्कड़ है दिल।

कातिलाना ऐसे ख्यालों पे..

शर्म से लाल हुए गालों पे..

तेरे मासूम सवालों पे..

उजली आवाज के प्यालों पे..

दो होठों का थप्पड़ है दिल।

(2×8)

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मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on January 31, 2021 at 10:10pm

आ. समर सर नहीं यह ग़ज़ल नहीं है, लेकिन एक निश्चित मीटर पर गीत के रूप हृदय के भावों को व्यक्त करने का मेरा प्रयास था।

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on January 31, 2021 at 10:07pm

आ. अमीरुद्दीन अमीर सर इस गीत पर आपकी दाद पाकर हृदय प्रसन्न हुआ।हौसलाफजाई के लिए तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Samar kabeer on January 30, 2021 at 3:27pm

जनाब 'जान' गोरखपुरी जी आदाब, आपने ऊपर अरकान ग़ज़ल के लिखे हैं,लेकिन ये ग़ज़ल तो नहीं है?

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' बाग़पतवी on January 30, 2021 at 11:46am

जनाब कृष मिश्रा 'जान' साहिब आदाब, दिल की विभिन्न भावनाओं का सुन्दर चित्रण करती उत्तम कविता हुई है दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ।  सादर।

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