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ग़ज़ल(22 22 22 22 22 22 2 )
किसने आज सजाई महफ़िल मेरी यादों की
कौन सफ़ाई का इच्छुक है अपनी आँखों की
**
दर्द बढ़ाती है पीरी का अपनों से दूरी
कौन समझता पीर जहाँ में घायल रिश्तों की
**
बाजू कट जाता है जिसका वो ही ये जाने
कितनी बढ़ती हैं तक़लीफ़ें उसके शानों की
**
कटता है दुनियादारी में जैसे तैसे दिन
लेकिन कटनी मुश्किल है तन्हाई रातों की
**
बेकारों के ख़्वाबों के देखे कितने मक़्तल
और हुई नफ़रत से तीखी नोकें दारों की
**
ज़िद कोई भी एक तरह की दहशतगर्दी है
बात बनेगी तब जब होगी क़द्र विचारों की
**
किस दल के अब हाथ लगेगी देखें वोट-बटेर
आंदोलन से है पौ बारह कुछ नेताओं की
**
गाली देकर वो कहते हैं माफ़ी भी दे दो
उम्मीदें हैं बाट लगेगी तांडव वालों की
**
ख़ूनी हमलों से दहलेगा क्या फिर से बंगाल
फ़िक्र 'तुरंत' लगी है सबको अपने वोटों की
**
गिरधारी सिंह गहलोत 'तुरंत ' बीकानेरी
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on January 29, 2021 at 5:56pm
किसने आज सजाई महफ़िल मेरी यादों की
कौन सफ़ाई का इच्छुक है अपनी आँखों की .... नयेपन लिए मतला, 
**
दर्द बढ़ाती है पीरी का अपनों से दूरी
कौन समझता पीर जहाँ में घायल रिश्तों की...वाह वाह 
**
बाजू कट जाता है जिसका वो ही ये जाने
कितनी बढ़ती हैं तक़लीफ़ें उसके शानों की...बेहतरीन आदरणीय
**
कटता है दुनियादारी में जैसे तैसे दिन
लेकिन कटनी मुश्किल है तन्हाई रातों की.....वाह वाह शानदार 
**
बेकारों के ख़्वाबों के देखे कितने मक़्तल
और हुई नफ़रत से तीखी नोकें दारों की...... दार का अद्भुत प्रयोग...गजब।
**
ज़िद कोई भी एक तरह की दहशतगर्दी है
बात बनेगी तब जब होगी क़द्र विचारों की.......वाह! वाह! वाह! हासिल ए ग़ज़ल 
**
किस दल के अब हाथ लगेगी देखें वोट-बटेर
आंदोलन से है पौ बारह कुछ नेताओं की........... वास्तविक चित्रण
**
गाली देकर वो कहते हैं माफ़ी भी दे दो
उम्मीदें हैं बाट लगेगी तांडव वालों की......बिल्कुल..
**
ख़ूनी हमलों से दहलेगा क्या फिर से बंगाल
फ़िक्र 'तुरंत' लगी है सबको अपने वोटों की........... महीन विश्लेषण आदरणीय।
अपने अल्पज्ञान में कुछ कहूं मेरी हैसियत कहां, फिर भी ग़ज़ल पढ़कर जो भाव उत्पन्न हुए वो टाइप कर रहा हूं,आदरणीय, मतले में मुझे गजलियत का अभाव सा लगा,हो सकता है मेरी समझ की कमी हो।सादर। 

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