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आवाज़ देती हैं ( ग़ज़ल)

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222/1222/1222/1222

कहीं भी जाइए रूस्वाइयाँ आवाज़ देती हैं

बुरे कर्मों की सब परछाइयाँ आवाज़ देती हैं

 कभी चिड़िया कभी गुड़िया कभी लख़्त-ए-जिगर कहकर

मुझे रस्मों की सब मजबूरियाँ आवाज़ देती हैं

बुलंदी पर पहुँचता है जो कोई अपनी मिहनत से 

जहाँ भर की उसे शाबाशियाँ आवाज़ देती हैं

भले ही आज होती हैं समानधिकार की बातें

लगी सदियों की सब पाबंदियाँ आवाज़ देती हैं

हताशा ज़िंदगी को जब कभी ख़ामोश है करती
लुढक कर ज़ह्र की तब शीशियाँ आवाज़ देती हैं

बिना मर्ज़ी बदन सौंपे विवश फेरों से होकर जो
छिपी तकियों में उसकी सिसकियाँ आवाज़ देती हैं

चली आती है अपने ख़्वाब अक्सर तोड़कर "राखी"

करे भी क्या जो ज़िम्मेदारियाँ आवाज़ देती है

(मौलिक,अप्रकाशित)

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Comment by Rakhee jain on November 29, 2022 at 7:46pm

आदरणीय जैफ़ जी बेहद शुक्रिया आपका

जी आदरणीय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए सुधार का प्रयास अवश्य करूंगी

Comment by Rakhee jain on November 29, 2022 at 7:44pm

आदरणीय समर कबीर साहब आपके द्वारा दिए गए वक्त और मार्गदर्शन के लिए हृदय से आभारी हूं

सुधार किए हैं आदरणीय  

मेरा सौभाग्य है कि आपका मार्गदर्शन प्राप्त हो रहा है 

Comment by Zaif on November 29, 2022 at 6:30pm

आ. राखी जी, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास है। आ. समर सर जी की इस्लाह क़ाबिल-ए-ग़ौर है। सादर।

Comment by Samar kabeer on November 24, 2022 at 6:41pm

मुहतरमा राखी जी आदाब, ओबीओ पटल पर आपका स्वागत है I 

ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I  ग़ज़ल के साथ उसके अरकान भी लिख दिया करें इससे सीखने वालों के लिए आसानी होती  है  I अब आते हैं आपकी ग़ज़ल की तरफ़ I 

'वतन की मिट्टी की ख़ातिर बदन की मिट्टी हो कुर्वां
उठा कर सर अगर ग़द्दारियाँ आवाज़ देती हैं'----इस शे`र के दोनों मिसरों में रब्त  नहीं है , देखिएगा  I 

'ढली रस्मों में सब मजबूरियाँ, आवाज़ देती हैं'---इस मिसरे में 'ढली' शब्द उचित नहीं है , उचित लगे तो इसकी जगह "मुझे" कर सकती हैं , और 'में' की जगह "की" शब्द उचित होगा , विचार करें I 

'बुलंदी पर पहुँचता जो बनाकर ख़ुद को है क़ाबिल
जहां पर भी रहे शाबाशियाँ आवाज़ देती है'----इस शे`र का वाक्य विन्यास ठीक नहीं उचित लगे तो इसे यूँ कहें :-

"बुलंदी पर पहुँचता है जो कोई अपनी मिहनत से 

जहाँ भर की उसे शाबाशियाँ आवाज़ देती हैं "

'तराजू ले अदालत में वो पट्टी बांध रहती और
क़तारों में सिसकती अर्जियाँ आवाज़ देती हैं'---इस शे`र का भाव स्पष्ट नहीं , कौन पट्टी बाँध रहती है? दोनों मिसरों में रब्त नही नहीं है , वाक्य विन्यास भी ठीक नहीं इस पर विचार करें I 

'भले ही आज होती हैं समानधिकार की बातें
लगी सदियों की सब पाबंदियाँ आवाज़ देती हैं'--- इस शे`र के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है देखिएगा I 

'लुड़ककर ज़हर की तब शीशियाँ आवाज़ देती हैं'---इस मिसरे में 'लुड़ककर'  को "लुढक कर" और 'ज़हर' को "ज़ह्र" लिखें 

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