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ग़ज़ल - अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा

1222 1222 1222 1222

अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा
परिंदा टूटा है बाहर अभी अंदर नहीं टूटा /1

सितारा यूंँ तो टूटा है मेरी तक़दीर का लेकिन
ख़ुदा का शुक्र है तदबीर का अख़्तर* नहीं टूटा /

हमारे ख़ैर ख़्वाहों ने बहुत चाहा मगर अब तक
हमारे दिल में है उम्मीद का जो घर नहीं टूटा /3

सियासत के सताने पर भी बोला जो हमेशा सच
वो जाने कैसी मिट्टी का है ज़र्रा भर नहीं टूटा /4

कई मख़्लूक़* की है ज़िंदगी गौहर का घर फिर भी
फ़क़त खारा कहा सबने मगर सागर नहीं टूटा /5

हर इक टूटी हुई शय से नयी इक चीज़ बनती है
न उसका कुछ बना दुनिया में जो अक्सर नहीं टूटा /6

निकलकर दुख के पर्वत से मिले पत्थर ही पत्थर पर
नदी-सी 'आरज़ू' का अब तलक तेवर नहीं टूटा /7 

स्वरचित व मौलिक

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Comment by Ravi Shukla on December 20, 2022 at 1:26pm

आदरणीया अंजुमन 'आरज़ू' जी , उम्दा ग़ज़ल कही है आपने बधाई स्वीकार करें I 

Comment by Samar kabeer on December 14, 2022 at 3:22pm

मुह्तारमा अंजुमन 'आरज़ू' जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें I 

'अभी बस पर ही टूटे हैं अभी अंबर नहीं टूटा
परिंदा टूटा है बाहर अभी अंदर नहीं टूटा '--- मतले के ऊ;ला मिसरे में 'अंबर' को "अम्बर" लिखें, मिसके सानी मिसरे में 'से' शब्द की कमी खल रही है, ग़ौर करें I 

'कई मख़्लूक़* की है ज़िंदगी गौहर का घर फिर भी
फ़क़त खारा कहा सबने मगर सागर नहीं टूटा '---इस शे`र के दोनों मिसरों में रब्त नहीं है, भाव भी स्पष्ट नहीं हुआ, ग़ौर करें I 

बाक़ी शुभ शुभ I 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 8, 2022 at 9:02am

आ. अंजुमन जी, अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा है हार्दिक बधाई।

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