दोहा - सप्तक...
गाफिल क्यों अंजाम से, तू आखिर नादान ।
तेरे इस अस्तित्व की, मिट्टी है पहचान ।।
धू -धू कर यह जिस्म जला, जले साथ अरमान ।
इच्छाओं की रुक गई, मैं - मैं भरी उड़ान ।।
ढह जाएंगे सब यहाँ, पत्थर के प्रासाद ।
मलबे होगे दंभ के, रोयेंगे उन्माद ।।
साँसों का चप्पू चले, धड़कन करती नाद ।
चित्रित अधरों पर हुए, अधरों के अनुवाद ।।
और -और की लालसा, मिटी न मिटे शरीर ।
भौतिक युग का आदमी , रहता सदा फकीर ।।
साथी वो किस काम के ,दें न वक्त पर साथ ।
वक्त पड़े तो छोड़ दें, साथी का जो हाथ ।।
मुँह बोली संवेदना, मुँह बोला व्यवहार ।
मुँह बोले संसार में, मुँह बोला है प्यार ।।
सुशील सरना / 21-12-23
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