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लफ़्ज़ों को हथियार बना
फिर उसमें तू धार बना

छोड़ तवज़्ज़ो का रोना
अपना इक मेयार बना

लंबा वृक्ष बना ख़ुद को
लेकिन छायादार बना

बेवकूफ़ियाँ बढ़ती गयीं
जितना बशर हुश्यार बना

शिकवा गुलों से है न तुझे?
तो कांटों को यार बना

जिसने दिखाई राह नई
वो दुनिया का शिकार बना

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by जयनित कुमार मेहता on July 14, 2024 at 4:02pm

आदरणीय समर कबीर जी, आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

Comment by Samar kabeer on July 14, 2024 at 12:05pm

आपके पास मेरा नम्बर हो तो कृपया फ़ोन कर लें, इतने विस्तार से लिखना मेरे लिए सम्भव नहीं है, आँखें ख़राब हैं ।

मेरा नम्बर ये है:-

9753845522

Comment by जयनित कुमार मेहता on July 14, 2024 at 11:56am

आदरणीय समर कबीर जी, सादर प्रणाम! ग़ज़ल तक पहुँच कर उचित मार्गदर्शन करने हेतु आपका हार्दिक आभारी हूँ। मतले के सन्दर्भ में आपके द्वारा प्रस्तावित मिसरे से सहमत हूँ। चौथे शेर का पहला मिसरा बेबह्र होने की बात मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। आपसे निवेदन है कि कृपया थोड़ी विस्तृत व्याख्या के साथ इसे समझाएँ।

आगे से ग़ज़ल के साथ अरकान लिखने का ध्यान रखूँगा।

Comment by Samar kabeer on July 13, 2024 at 3:51pm

जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'फिर उसमें तू धार बना'

इस मिसरे को उचित लगे तो यूँ कहें:-

'फिर उनकी तू धार बना'

'बेवकूफ़ियाँ बढ़ती गयीं'

ये मिसरा बह्र में नहीं है, देखिएगा ।

ओबीओ की परिपाटी के अनुसार ग़ज़ल के साथ उसके अरकान भी लिख देना चाहिए ।

कृपया ध्यान दे...

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