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अमावस सी ज़िंदगी में

अचानक ही 
छिटक गयी चाँदनी 
एक बादल की ओट से 
निकलते हुए 
चाँद ने कहा 
क्यूँ मायूस हो ? 
मैं हूँ न ..
और यह कह 
मुस्कुरा दिया 
मैं खो गयी 
उस मुस्कान में 
उसकी स्निग्ध शीतलता ने 
जैसे दग्ध मन पर 
रख दिए 
बर्फ  के फाहे 
और 
पिघलता रहा 
बूँद बूँद 
जो हृदय 
पत्थर हो चला था ...

 

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Comment

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Comment by sangeeta swarup on July 28, 2011 at 3:30pm

गणेश जी बागी , 

आपने जिस तरह कविता की समीक्षा की है ऐसे बहुत कम लोंग करते हैं ... आपकी इतनी सार्थक टिप्पणी के लिए हृदय से आभारी हूँ ..ऐसे ही हौसला बढाते रहिएगा ..

Comment by Bishwajit yadav on July 28, 2011 at 1:12pm
बर्फ  के फाहे 
और 
पिघलता रहा 
बूँद बूँद 
जो हृदय 
पत्थर हो चला था ...
nice line.............bahut badeay .......

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 28, 2011 at 1:09pm
चाँद ने कहा 
क्यूँ मायूस हो ? 
मैं हूँ न ..
और यह कह 
मुस्कुरा दिया 
मैं खो गयी ....
आहा ! जिन्दगी की सच्चाई से बिलकुल नजदीक, भावनाओं की खुबसूरत अभिव्यक्ति, जरा सा प्यार मिला नहीं की मानव मन उसे संजोने में लग जाता है ......
पिघलता रहा 
बूँद बूँद 
जो हृदय 
पत्थर हो चला था ...
वाह वाह क्या कहने, समय हर घाव को भर देता है, पत्थर दिल भी एक दिन पिघल जाता है, कुछ इसी तरह के भाव मिल रहे है इन पक्तियों में |
कुल मिलाकर कवित्री कामयाब है एक छाप छोड़ जाने में, बेहतरीन अभिव्यक्ति पर ह्रदय से बधाई स्वीकार करे संगीता स्वरुप जी |
Comment by sangeeta swarup on July 28, 2011 at 12:44pm

राज जी  और गणेश जी ,

रचना पसंद करने के लिए आभार 

Comment by ganesh lohani on July 28, 2011 at 11:51am

बहुत बढ़िया रचना है |

 

Comment by राज लाली बटाला on July 27, 2011 at 8:40pm

khoob hai g !

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