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बाल गीत: बरसे पानी --संजीव 'सलिल'

बाल गीत:

बरसे पानी
संजीव 'सलिल'
*

रिमझिम रिमझिम बरसे पानी.
आओ, हम कर लें मनमानी.

बड़े नासमझ कहते हमसे
मत भीगो यह है नादानी.

वे क्या जानें बहुतई अच्छा
लगे खेलना हमको पानी.

छाते में छिप नाव बहा ले.
जब तक देख बुलाये नानी.

कितनी सुन्दर धरा लग रही,
जैसे ओढ़े चूनर धानी.

काश कहीं झूला मिल जाता,
सुनते-गाते कजरी-बानी.

'सलिल' बालपन फिर मिल पाये.
बिसराऊँ सब अकल सयानी.
*

 

 

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Comment

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Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on August 16, 2011 at 12:44pm

***आदरणीय आचार्य जी आपकी सरस-गंभीरता आपके प्रति आदर के भाव है.!बहुत ही सुंदर रचना***********


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 14, 2011 at 9:05pm

आचार्य जी , आपकी रचना मुझे बचपन की सैर करा दी , याद आ गया मुझको गुजरा ज़माना , बहुत ही सुंदर रचना , साधुवाद |

Comment by sanjiv verma 'salil' on August 12, 2011 at 10:32pm

satish ji, saurabh ji, arun ji

aapkee gungrahakata ko naman.

Comment by Abhinav Arun on August 12, 2011 at 8:21pm

हम तो खो गए आचार्यवर बचपन में यही इस गीत की सफलता है वाह !!


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 6, 2011 at 9:59pm

आदरणीय आपकी सरस-गंभीरता आपके प्रति आदर के भाव जगाती है.

 

//'सलिल' बालपन फिर मिल पाये.
बिसराऊँ सब अकल सयानी.//

बालपन में सभी सयाना हो जाने की बात कहते थे. पर सही तो ये है कि इस ’सयानेपन’ से कोई खुश रहता नहीं है.

बार-बार दिल उपट उठता है ...".. चलो मन गंग-जमुन के तीर.. "

Comment by satish mapatpuri on August 6, 2011 at 5:08pm

'सलिल' बालपन फिर मिल पाये.
बिसराऊँ सब अकल सयानी.

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति.साधुवाद स्वीकार करें.

कृपया ध्यान दे...

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