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सुलेखा पांडे की तीन कविताएँ

अजनबीपन

दर्पण के पीछे है
एक और दर्पण
मन के भीतर है
एक और मन

शब्दों के जाल में
अनजाने भाव है
ऊपर से गहराई
नापते हैं हम

रात की सियाही में
दर्द के सैलाब पर
अंधेरे की चादर
तानते हैं हम

शूलों के दर्द में
फूल जो महका
उसकी ही रुह से
अनजान है हम

अपनी ही काया के
भीतर जो छाया है
उसकी सच्चाई कब
पहचानते हैं हम

दर्पण के पीछे..
मन के भीतर
***
मृत्युंजय

यह सच होगा कि
शिव ने किया था
विषपान
क्या आज भी
हम सभी
अपने कंठ के नीचे
नही उतारते
हलाहल
रोज रोज ?
फिर क्यों नहीं
बन जाते हम भी
मृत्युंजय
***
उम्र

उम्र
हथेली में थमा
रेशमी धागों का
गुच्छा...
जिसे जितना
थामने का प्रयास करो
वह उतना ही
फिसलती जाती है...
*******

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Comment by आशीष यादव on August 28, 2010 at 5:05pm
उम्र
हथेली में थमा
रेशमी धागों का
गुच्छा...
जिसे जितना
थामने का प्रयास करो
वह उतना ही
फिसलती जाती है...

itni achchhi-achchhi kawitaaye aapne ham tak pahuchaaee. bahut bahut dhanyawaad

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on August 4, 2010 at 1:48pm
नरेन्द्र भाई, बहुत बहुत आभार आपका इतनी खुबसूरत रचनायों से रूबरू करवाने के लिए ! सुलेखा पाण्डेय जी को भी मेरा साधुवाद !

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 3, 2010 at 11:40pm
बहुत बहुत धन्यवाद,आदरणीय भाई नरेन्द्र व्यास जी , आज आप के वजह से हम लोग इस खुबसूरत कविता को पढ़ पा रहे हैं, आदरणीया सुलेखा पाण्डेय जी ने बहुत ही अच्छी कविता कही है, उनको भी इस खुबसूरत अभिव्यक्ति हेतु बधाई ,

कृपया ध्यान दे...

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