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दो छोटी कविताएँ

मैं
नदी का बहाव नहीं
ना वक्त
मेरी फितरत है
लौटता हूँ
नमी बन
रिसता हूँ
तुम्ही में

***

इधर कविता
पीर की परिधि पर
साकार हो
शब्दों में
भरती रही भाव;
उधर
एक जिंदगी
मेरी कविता को
आकार देती सी
एक
नवजात कविता
आँचल में संजोये,
एक और
नई कविता का
तलाशती धरातल
माथे पे ले तगारी
उतरती
उस गोल घुमावदार
सीढ़ियों से
किसी मौल के
***

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Comment

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Comment by sanjiv verma 'salil' on August 22, 2010 at 2:28pm
नव प्रतीकों और बिम्बों से समृद्ध पठनीय रचनाएँ.
Comment by आशीष यादव on August 21, 2010 at 12:11am
नरेन्द्र जी प्रणाम स्वीकार करिए|
आपने जिस विलक्षणता को दर्शाया है काबिले तारीफ़ है|

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 19, 2010 at 9:11pm
समर्पण का अद्भुत चित्रण! दो अग्रगामी प्रतीकों को प्रस्तुत कर अपने को विलग रखने की व्याख्या और फिर उससे उलट अपने लौट आने की प्रक्रिया. फिर नमी बनने का साग्रह स्वीकृति वह भी उस अमूर्त, अव्यक्त में रिस-रिस कर घुल जाने के लिए.
कवि के प्रयास पर हार्दिक बधाई.

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on August 19, 2010 at 8:27pm
इधर कविता
पीर की परिधि पर

उस गोल घुमावदार
सीढ़ियों से
किसी मौल के

पहली पंक्ति से लेकर अंतिम पंक्ति तक का सामंजस्य अद्भुत है....दोनों ही कविताये सुन्दर लगी....
Comment by Deepak Sharma Kuluvi on August 19, 2010 at 5:12pm
NARINDER JI WRITTEN BEAUTIFULLY

AAPKA APNA

KULUVI

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 18, 2010 at 9:29pm
आदरणीय नरेन्द्र भाई साहब, आपकी दोनों कविता एक से बढ़कर एक है, दूसरी कविता मे कविता का प्रयोग जिस तरीके से किया गया है वो कविता को अलंकृत कर रही है, उम्द्दा अभिव्यक्ति है , बहुत बहुत धन्यवाद इस शानदार प्रस्तुति पर

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