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बेच दूंगा मैं खुद को खरीदेंगे आप

बेच दूंगा मैं खुद को खरीदेंगे आप
सोच के आज आया हूँ बाज़ार में --
दोस्तों मेरी कीमत जियादह नहीं
मैं भी बिक जाउंगा आपके प्यार में |

पहले हर बोल के मोल को तौलिये
'बाद में जो मुनासिब लगे बोलिए ---
बोल से ही तो जाहिर ये होता है के
'कितनी तहजीब होगी खरीदार में

इतनी जुर्रत कहाँ के लगा लूँ गले
ये भी हसरत नहीं के गले.से लगूं ---
जो मजा पा के सौ बार मिलता नहीं
वो मजा खो के पाया है एक बार में |

बिक रही है जमीं बिक रहा आसमां
बिक रहा है चमन बिक रहा बागवां --
अय तपिश जो अभी तक ना बेचीं गई
'वो कलम साथ लाया हूँ बाज़ार में ----
मेरे काव्य संग्रह ---कनक ---से

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on August 11, 2010 at 9:53am
आदरणीय तपिश जी आज आप ने पुन: एक बेहतरीन रचना परोसी है,
दौलत देकर हमे जो खरीद सके,
ऐसा कोई जग मे खरीदार कहाँ ?
हम तो बिक जाते बिन मोल ही ,
मिलता है प्यार के दो बोल जहाँ,

अच्छी रचना के लिये बधाई आप को , स्वीकार करे ,
Comment by jagdishtapish on August 10, 2010 at 2:57pm
माननीय प्रीतम जी
वाकई कुछ भी तो नहीं है दुनियां में एक प्यार के सिवा
क्या लाये हैं क्या ले जायेंगे ? आपने सच कहा
बशर्ते प्यार सच्चा होना चाहिए दिखावा नही....
आपने हमारी हौसला अफजाई की ह्रदय से आभारी हैं हम आपके|
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on August 10, 2010 at 2:17pm
बेच दूंगा मैं खुद को खरीदेंगे आप
सोच के आज आया हूँ बाज़ार में --
दोस्तों मेरी कीमत जियादह नहीं
मैं भी बिक जाउंगा आपके प्यार में |

बेहतरीन रचना है तपिश सर...वैसे एक एक बात सही भी है की पैसे की क्या मोल है लोग तो सच्चे प्यार मे बिक जाते हैं..बशर्ते प्यार सच्चा होना चाहिए दिखावा नही....

बहुत ही बढ़िया रचना है...दिल से बहुत बहुत धन्य्बाद..

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