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"अक्षर ही न जाने वो किताब क्या पढ़ पाएँगे
पानी मे बिना तैरे खुद मर जाएँगे
ज्ञान न जानो विज्ञान न जानो तुम
संविधान को तुम कैसे समझ पाओगे
लोकतंत्र का अर्थ मालूम नहीं हे जिन्हे
उनका हे दावा लोकतंत्र को बचाएँगे."

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 4, 2011 at 7:51pm

इंगित को अवगुंठित देखा, तिर्यक-प्रेषण अद्भुत पाया..  

बधाई..


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 4, 2011 at 5:22pm

लाठियां चलाएंगे, आवाज को दबायेंगे,

लोक को डरा कर लोकतंत्र को बचायेंगे |

 

मोनिका जी इस लघु काव्य कृत हेतु आभार आपका |

Comment by Kailash C Sharma on September 3, 2011 at 3:06pm

बहुत सार्थक और सटीक प्रस्तुति. बधाई !

Comment by आशीष यादव on September 3, 2011 at 1:51pm

सच्चाई है,
इस रचना हेतु बधाई|

Comment by satish mapatpuri on September 3, 2011 at 12:03am

लोकतंत्र का अर्थ मालूम नहीं हे जिन्हे
उनका हे दावा लोकतंत्र को बचाएँगे."

मोनिका जी, ख्याल बेहतरीन है, बधाई.

कृपया ध्यान दे...

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