एक हुए दोहा यमक:
संजीव 'सलिल'
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लिए विरासत गंग की, चलो नहायें गंग.
भंग न हो सपना 'सलिल', घोंटें-खायें भंग..
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सुबह शुबह में फर्क है, सकल शकल में फर्क.
उच्चारण में फर्क से, होता तर्क कु-तर्क..
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बुला कहा आ धार पर, तजा नहीं आधार.
निरा धार होकर हुआ, निराधार साधार..
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ग्रहण किया आ भार तो, विहँस कहा आभार.
देय - अ-देय ग्रहण किया, तत्क्षण ही साभार..
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नाप सके भू-चाल जो बना लिये हैं यंत्र.
नाप सके भूचाल जो, बना न पाये तंत्र..
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शह देती है मात तो, राह भटकता लाल.
शह पाकर फिर मात पा, हुआ क्रोध से लाल..
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दह न अगन में दहन कर, मन के सारे क्लेश.
लग न सृजन में लगन से, हर कर हर विद्वेष..
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सकल स कल कर कार्य सब, स कल सकल मत देख.
अकल अ कल बिन अकल हो, मीन मेख मत लेख..
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दान नहीं आदान है, होता दान प्रदान.
नादां ने ना-दान कह, किया निदान प्रदान..
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जान बूझकर दे रही, जान आप पर जान.
जान बचाते फिर रहे, जान जान से जान..
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एक खुशी मुश्किल हुई, सुलभ हुए शत रंज.
सारे सुख-दुःख भुलाकर, चल खेलें शतरंज..
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Acharya Sanjiv Salil
Comment
शाब्दिक स्वतंत्रता और भाव उन्मुक्तता को सम्मान देते इन दोहों के लिये आपका सादर धन्यवाद आचार्यवर.
वैसे प्रत्येक दोहे संकलन योग्य और उदाहरण सदृश हैं जो साहित्यानुरागियों के साथ-साथ भाषा के विद्यार्थियों के लिये भी बेशकीमती हैं. दोहों से सार्थक और सारगर्भित अर्थ निस्सृत हुये हैं.
पुनश्च सादर अभिनन्दन.
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