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लड़ता रहा कबीर..

मन से फक्कड़ संत वह, तन से रहा फ़कीर.

खड़ीं सामने रूढ़ियाँ, लड़ता रहा कबीर..


तेरह-ग्यारह नाप के, रचे हजारों छंद.
दोहे संत कबीर के, करे बोलती बंद..


पूजे लोग कबीर को, ले अँधा विश्वास..
गड़े कबीरा लाज से, दोहे हुए उदास..


थोडा बोलो चुप रहो, सुनो लगा कर कान.
छोटे मुख मै क्या कहूं, कह गए लोग सुजान..


कथ्य कला काया कसक, कागज़ कलम किताब.
सब मिल कर पूरा करे, ज्ञानदेव का ख्वाब..

अविनाश बागडे.

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Comment

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Comment by AVINASH S BAGDE on February 15, 2012 at 10:59am

Saurabh ji,Siya ji,Bagi ji,Ambarish bhai..sabhi ka aabhar.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on October 14, 2011 at 9:20pm

तेरह-ग्यारह नाप के, रचे हजारों छंद.

दोहे संत कबीर के, करे बोलती बंद..   

पहली पंक्ति  ’तेरह-ग्यारह...छंद’--

समझ चुके हैं तथ्य तो, इसे बाँधिये गाँठ 

तेरह चौदह हों नहीं, बने न गिनती आठ ...   :-)))

दूसरी पंक्ति   ’दोहे संत... बोलती बंद’--

कैसे भाई कह दिया, दोहे कर दें चुप्प ?

अगर कबीरा को पढ़ें, रहे न मन में घुप्प !! ...  

 

दिली बधाई आपको, है भाई अविनाश

दोहे सम्यक हैं बने,  बढिया हुआ प्रयास..

 

Comment by siyasachdev on October 8, 2011 at 11:49am

wah bahut hi khoobsurat dohe kahe hain janab ...har ek doha ek achha sandesh liye hue hain...bahut hi khoobsurat soch wah...badhayi sweekaar kare hamari ...


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on October 5, 2011 at 6:13pm

वाह वाह, बेहतरीन दोहे, महापुरुषों को याद करने का एक बहाना दे जाते है ये दोहे, बधाई स्वीकार करे |

Comment by Er. Ambarish Srivastava on October 5, 2011 at 4:39pm

अच्छे दोहे हैं रचे, भाई जी अविनाश.
सारे सब ऐसे खिले, ज्यों हो खिले पलाश.. 
बहुत-बहुत बधाई आपको .........

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