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मिलन की ओस से निखरा ये गुलाबी चेहरा
आखिरी लम्हों की कुछ भर दो सफेदी इनमे
रीत ही जाएगा आखिर ये छलकता अमृत
सुर्ख होठों पे अभी से जरा सी प्यास धरो
बाल बिखरा तो दिए है ये बहुत खूब किया
इनमे अब भटके हिरन सी जरा उलझन डालो
इसकी आँखों में ये जो ख्वाब सजा रखा है
अभी ये ख्वाब चमकते हैं सुनहले है बहुत
सुनहरे ख्वाब की पलकों पे सजा दो काजल
और काजल सने कोरों पे दो आसूं रख दो
अभी कुछ प्यार की बारीकियां भरो इनमे
मेरे जीवन की ये तस्वीर अधूरी है अभी

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मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 26, 2011 at 11:50pm
सुनहरे ख्वाब की पलकों पे सजा दो काजल
और काजल सने कोरों पे दो आसूं रख दो
अभी कुछ प्यार की बारीकियां भरो इनमे
मेरे जीवन की ये तस्वीर अधूरी है अभी

बहुत खूब भाई अरुण श्रीवास्तव जी, बड़ी ही बारीकी से आपने कथ्य को कविता में ढाला है, बधाई स्वीकार करें | 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 23, 2011 at 5:24pm

मेरी नज़रों से अरुणजी आपकी कोई पहली रचना गुजरी है. और यह पहली रचना ही मन को मुग्ध कर गयी.  प्रत्येक पंक्ति क्या-क्या-क्या इंगित करती आगे निकलती जाती है कि पढ़ना अनुभव बनता जाता है.

हार्दिक बधाई


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on November 23, 2011 at 2:13pm

आपकी इस नज़्म में बला की रवानी है भाई अरुण जी !कविता के भाव भी बहुत सुंदर है और बात कहने का ढंग भी दिलकश है ! मेरी दिली बधाई स्वीकार करें ! 

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