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सूद पहले फिर असल दो

इक मुहब्बत की ग़ज़ल दो

जो परिन्दे छत पे आयें

उनको दाने और जल दो

शक्ल वैसी ही रहेगी

आईना चाहे बदल दो

धर्मशाला है ये दुनिया

रात काटो और चल दो

ये बदन कल तक नया था

अब पुराना है बदल दो

तुम सवेरे-शाम आओ

मेरे जीवन में खलल दो

......दीपक कुमार

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Comment

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Comment by shashiprakash saini on January 12, 2012 at 2:27am

बहुत सुन्दर ग़ज़ल है दीपक जी

बधाई स्वीकारे 

Comment by दीपक कुमार on January 11, 2012 at 8:39pm

डॉ ए कीर्तिवर्धन जी और श्री अरुण कुमार पाण्डेय 'अभिनव' जी बहुत-बहुत शुक्रिया !! अभिनव जी आपने सही कहा, पहले वाली ग़ज़ल गलती से डिलीट हो गयी थी, इसलिए मैंने इसे पुनः पोस्ट किया है.

Comment by dr a kirtivardhan on January 11, 2012 at 1:06pm

bahut khoob dost

Comment by Abhinav Arun on January 11, 2012 at 9:47am
छोटी बहर की अच्छी ग़ज़ल सभी शेर नयी ताजगी लिए हुए हैं |
मैंने पहले भी शायद इसे यहाँ पढ़ा है और तारीफ भी की है लगता है आपने पुनः सुधार कर पोस्ट की है ???

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