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shashiprakash saini
  • 31, Male
  • Navimumbai, Maharashtra
  • India
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mohinichordia and shashiprakash saini are now friends
Jan 7, 2014
shashiprakash saini posted photos
Jul 27, 2013
Neeraj Mishra "प्रेम" liked shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
Jul 25, 2013
shashiprakash saini commented on shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
"सौरभ जी , प्राची जी , आशुतोष जी मेरे भाव आप तक पहुंचे आप ने कविता को सराहादिल गद गद हो गया हार्दिक आभार"
Jul 25, 2013
shashiprakash saini commented on shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
"सराहना हेतु आभार श्याम जी , अन्नपूर्णा जी , किशन जी"
Jul 25, 2013
Dr Ashutosh Mishra commented on shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
"मुझे स्कूल के बाहरबेर बेचती वो मौसी चाहिए..और तो तमाम बातें मन को छू गयी पर मौसी का जवाब नहीं ..बेर वाली मौसी ये लगभग हर बचपन से जुडी हैं ..आपने सचमुच खुदा से जो कुछ भी माँगा उससे ज्यादा बेहतर कुछ माँगा भी नहीं जा सकता है ..जितनी तारीफ़ की जाए कम है…"
Jul 25, 2013

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
"संस्मरण को शब्द मिले, अच्छा लगा. शुभकामनाएँ"
Jul 24, 2013
annapurna bajpai commented on shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
"kya khub manga hai aapne , adarniy shashi ji . dil se dua hai aapko vo sab mil jaye jo apne manga hai ."
Jul 23, 2013
Shyam Narain Verma commented on shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
"बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर रचना के लिए …………….."
Jul 23, 2013
Shyam Narain Verma liked shashiprakash saini's blog post मांगो वत्स क्या मांगते हो
Jul 23, 2013
shashiprakash saini posted a blog post

मांगो वत्स क्या मांगते हो

रात स्वप्न में, प्रभु थे खड़े बोले मांगो वत्स क्या मांगते हो जमीं चाहते हो या आस्मां चाहते होबड़ी गाडी बड़ा घर नोटों की गट्ठर या सत्ता सुख कुर्सी से हो कर जो चाहो अभी दे दूँ एक नयी ज़िन्दगी दे दूँमैंने माँगा तो क्या माँगा एक बेंच पुरानीं सी वो पीछे वाली मेरे स्कूल कीचाहिए मुझे वो बचपन के ज़माने दोस्त पुराने मदन के डोसे पे टूटना चेतन का वो टिफिन लूटना अपना टिफिन बचाने में टीचर क्लास सभी को भूले हम मस्त थे खाना खाने मेंमुझे वो होली चाहिए ओ एन जी सी कॉलोनी चाहिए वो ठंडाई वाली ट्रक वो लड़कपन की सनक…See More
Jul 23, 2013
shashiprakash saini posted photos
Jul 11, 2013
shashiprakash saini commented on Albela Khatri's blog post रिश्वत खाना पाप नहीं है बाबाजी
"बहुत बढ़िया सर जी  आपकी ये रचना होठो पे हँसी ले आई  अठन्नी चवन्नी का दर्द भूल गए " साबुन कंघी लाली लिपिस्टिक मेकअप के खर्चे और घर मे है झिकझिक  बीवी जी मांगे बनारसी साड़ी तनख्वा ने सारी फिर इज्ज़त उतारी ज़ेबो मे ढूंढा तो…"
Jul 14, 2012
shashiprakash saini liked Albela Khatri's blog post रिश्वत खाना पाप नहीं है बाबाजी
Jul 14, 2012
Albela Khatri left a comment for shashiprakash saini
"swagat hai saini ji"
Jul 14, 2012
shashiprakash saini and Rekha Joshi are now friends
Jul 5, 2012

Profile Information

Gender
Male
City State
navimumbai maharashtra
Native Place
ghazipur (U.P)
Profession
student (mba @ FMS BHU Varanasi)

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Shashiprakash saini's Blog

मांगो वत्स क्या मांगते हो

रात स्वप्न में, प्रभु थे खड़े

बोले मांगो वत्स क्या मांगते हो

जमीं चाहते हो या आस्मां चाहते हो

बड़ी गाडी बड़ा घर नोटों की गट्ठर

या सत्ता सुख कुर्सी से हो कर

जो चाहो अभी दे दूँ

एक नयी ज़िन्दगी दे दूँ

मैंने माँगा तो क्या माँगा

एक बेंच पुरानीं सी

वो पीछे वाली मेरे स्कूल की

चाहिए मुझे

वो बचपन के ज़माने

दोस्त पुराने

मदन के डोसे पे टूटना

चेतन का वो टिफिन लूटना

अपना टिफिन बचाने में

टीचर…

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Posted on July 23, 2013 at 11:00am — 7 Comments

तेरे साथ की जरुरत है

तन की नक्काशी कही धोखा ना देदे

मन से पुकारे की एक आवाज की जरुरत है

साथ तेरे चलने से जले या ना जले दुनिया

पर क़यामत तक चले की तेरे साथ की जरुरत है

 

 

झुर्रियाँ बाल सफ़ेद

सब उम्र के फरेब

तन…

Continue

Posted on March 10, 2012 at 2:00am — 7 Comments

ये आज का युवा हैं

आंधी हैं हवा हैं

बंधनों में क्या हैं

ये उफनता दरिया हैं  

किनारे तोड़ निकला हैं

मस्ती में मस्तमौला हैं

मुश्किल में हौसला हैं

अपनी पे आजाए तो जलजला हैं

ये आज का युवा हैं

 

कभी बेफिक्री का धुआँ हैं

कभी पानी का बुलबुला हैं

कभी संजीदगी से भरा हैं

ये आज का युवा हैं

पंखों को फडफडाता हैं

पेडों पे घोंसला बनाता है

अब की उड़ना ये चाहता हैं

दाव पे ज़िंदगी लगता हैं

हारा भी…

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Posted on February 5, 2012 at 12:22am — 8 Comments

कोयलिया जब गाती है

चल झूठ रूठना है तेरा

आंखें सब बतलातीं है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

आँखों से अब ना आस गिरा

बातों पे रख विश्वास जरा

जाने दे मत रोक मुझें

सर पे दुनियां दारी है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

न तू भूलीं न मैं भुला

जब झूलें थे सावन झुला

मौसम अब के बरसातीं है

कोयलिया जब गाती है

याद मीत की आती है

 

चलतें थे तट पे साथ प्रिये

नटखट हाथों में हाथ…

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Posted on January 19, 2012 at 4:00am — 2 Comments

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At 10:28am on July 14, 2012, Albela Khatri said…

swagat hai saini ji

At 10:38pm on January 8, 2012,
सदस्य कार्यकारिणी
अरुण कुमार निगम
said…

शशिप्रकाश जी, धन्यवाद.

At 11:04am on December 31, 2011, Arun Sri said…

स्वागत है सर !

At 9:31pm on December 29, 2011, Admin said…

 
 
 

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rajesh kumari commented on rajesh kumari's blog post हैं वफ़ा के निशान समझो ना (प्रेम को समर्पित एक ग़ज़ल "राज')
"आद० मोहम्मद आरिफ जी, आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से बहुत बहुत शुक्रिया |"
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सदस्य कार्यकारिणी
rajesh kumari commented on rajesh kumari's blog post हैं वफ़ा के निशान समझो ना (प्रेम को समर्पित एक ग़ज़ल "राज')
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