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भूतिया वो पेड़

खिड़की से नज़र आता

भूतिया वो पेड़

जिसकी हर एक शाख

पतझड़ की सोच में डूबी

मानो उंगलियाँ

और पत्ते...

आसेबी हवा के ज़ोर से

झुकते हुए

पर नुकीले नाखूनों की तरह

मुझ को खरोंचते

डराते और मैं....

 यकलख्त

करती बंद खिड़की !

पर अपनी सोच के दरीचे

बंद कैसे करती....!! ?


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Comment

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Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 26, 2012 at 8:38pm

खुबसूरत अतुकांत कविता का एक बढ़िया उदाहरण, अच्छी कविता बन पड़ी है, बधाई स्वीकार करे |

Comment by राज लाली बटाला on January 25, 2012 at 2:52am

पर अपनी सोच के दरीचे

बंद कैसे करती....!! ? Khoob!

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