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उठो साथियों!

उठो साथियों उठ के घर से चलो,
मोहब्बत के तुम अब मदरसे चलो.
अमन की नई  तुम रिसाले गढ़ो  ,
इल्मो-ईमान की तुम डगर से चलो.
बारूदों की जहां पर सुरंगे बिछें ,
साजिशों से भरे उस शहर से चलो.
ऐसी हस्ती बनो, लोग पूजा करें,
बढ़ के सजदा करें तुम जिधर से चल
फिर, फिरंगी तुम्हे बरगलाये नहीं,
साथ आओ, न ऐसे बिखर के चलो.
है बड़प्पन इसी में, इसी बात में,
बा-अदब हो के नीची नज़र से चलो.
लूट ना ले कोई कारवां रह में,
ना बेहोश हो,बेखबर से चलो.
लेके जाये जो तुमको गलत राह पे,
अलहदा हो के ऐसे सफ़र से चलो.
अविनाश बागडे.(मेरी पुस्तक 'सूखी नदी के सामने' से.)

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Comment by Sanjay Mishra 'Habib' on January 26, 2012 at 8:53pm

मोहब्बत के अब तुम मदरसे चलो...

बहुत खूब आदरणीय अविनाश भाई जी... वाह!

शानदार प्रस्तुति. सादर बधाइयां...


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 26, 2012 at 8:06pm
//ऐसी हस्ती बनो, लोग पूजा करें,
बढ़ के सजदा करें तुम जिधर से चल//
बहुत खूब बागडे साहब, खुबसूरत अभिव्यक्ति, इस जिंदादिल प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करे |

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on January 26, 2012 at 2:16pm

bahut achchi prernadayak prastuti.

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