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बंदरों को तो फंसना ही है

मित्रों ,यह कविता बिहार में अक्टूबर -नवम्बर २०१० में होने वाले चुनाव के परिपेक्ष्य में लिखा गया है ॥लालटेन
तीर ,हाथ और कमल ...विभिन्न राजनितिक दलों के चुनाव चिन्ह है //

आ गया मदारी
बजा रहा है डुगडुगी
बंदरों में होने लगी है सुगबुगी
अनेकों हैं नुस्खे
बंदरों को रिझाने के
नज़र डालिएगा इन पर जरा हंस के ॥

पिछली गल्तियाँ अब नहीं करूगाँ
सवर्णों को भी टिकट दूगाँ॥
अपने शाले ने भोंका था भाला
लगाने चला था मेरे ही घर में ताला
इसीलिए घर से उसको निकाला
रोशनी फैलाना ही बचा है मेरा काम
चाहे जाए तो जाए मेरा प्राण
आप ही हैं मेरे कृपा निधान
बातें सुन लो मेरी खोलकर अपने कान ॥


दौड़ पड़े है बन्दर
मदारी ने ऐसा मारा मंतर
विकास का टायर
भाषणों से होने लगा पंचर
लगता है जाति की हवा चलेगी
ईसीसे सबकी दाल गलेगी॥

दिल्ली का फंडा
बिहार में बना है गुल्ली -डंडा
यहाँ "हाथ " का साथ नहीं
"लालटेन " बिन रात नहीं
बिना" तीर" के घात नहीं
"कमल" बिना कोई बात नहीं ॥

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Comment by आशीष यादव on September 9, 2010 at 4:15pm
Bahut badi hakikat h yah. Aapne bahut sahi likha.
Comment by baban pandey on September 9, 2010 at 12:28pm
मित्रो ..बिहार के ..मदारियों से बच के रहना रे भी
गणेश भाई ....आपनेबिहारी मदारी का विस्तृत वर्णन किया
जय को

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 9, 2010 at 10:03am
बढ़िया बब्बन भईया, ये मदारी बड़े ही करतब बाज है, थोड़ा बच के रहने की जरूरत है, ये बंदरो को फसा कर उल्लू , बोक्का(बकरा) और गदहा भी बनाने मे कुशल होते है तथा अपने रंग बदलने मे गिरगिट को बहुत पहले मात कर चुके है |
बच के रहना रे बाबा बच के रहना रे ................

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