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गुरु गोविन्द   द्वारे  खड़े सबके  लागों पायं

स्वागत प्रभु आप  का  ई लेओं  भांग  लगाये.

 

 

बूढ़ा तोता बोले राम राम भंग पी अब बौराया है

बीत गया मधुर मास खेलो होली  फागुन आया है.

 

 

भांग नशा नहीं औषधि है प्रयोग बड़ा है  गुणकारी

पहले इसको अन्दर कर लो फिर खेलो पिचकारी

 

 

दे तरंग , भरे उमंग , महिमा इसकी न्यारी

जो करता सेवन  प्रतिदिन मारे वो किलकारी

 

रीता था जीवन मेरा  अब सब कुछ पास है

भोले की किरपा बरसे बस ये ही अरदास है

 

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Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 10, 2012 at 7:09pm

स्नेही संदीप जी, आप तो जानते हैं की मैं कवि नही. तुकबंदी की है. आपकी तारीफ इसे रचना बना देगी.
आभार .

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 10, 2012 at 6:44pm

आदरणीय कुशवाहा को प्रणाम,

होली के रंग, भंग, उमंग, तरंग (और जितनी भी तुकें हों) का उल्लास बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है आपने| आभार,

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 9, 2012 at 4:14pm

adarniy saurabh ji,sadar  pranam. akele hi akele anand liyen hai. dhanyavad, shubh holi.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on March 9, 2012 at 1:10am

शिव-बूटी की महिमा !! वाह !!!

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