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दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,,,,,,

दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं,,,

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मॆरी तस्वीर जॊ लगाकॆ सीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥

दॆखना है दिल कितनॆ करीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥१॥

 

मॊहब्बत मॆं जां लुटानॆ की बात करतॆ हैं,

मॆरॆ लहू का माप, जॊ पसीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥२॥

 

यॆ और बात है, मैं ज़िंदा हूं, अब तलक, 

नज़र वॊ मुझ पॆ कई महीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥३॥

 

आज कल फ़रिश्तॆ कहॆ जातॆ हैं वॊ लॊग

खुद कॊ दूर जॊ डूबतॆ सफ़ीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥४॥

 

ज़िंदा-दिली उनकॊ न, रास आयॆगी कभी,

कम-ज़र्फ़ तॊ रिश्तॆ कमीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥५॥

 

आतॆ हैं खातॆ-पीतॆ हैं चलॆ जातॆ हैं लॊग,

ज़मानॆ सॆ नहीं मतलब जीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥६॥

 

मंदिर मॆं पियॆं या फ़िर मस्ज़िद मॆं पियॆं,

उसकॆ आशिक़ मतलब पीनॆं सॆ रखतॆ हैं ॥७॥

 

उनकी हिफ़ाज़त  ख़ुदा करता है "राज",

ख्यालॊ-किरदार जॊ नगीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥८॥

 

 

        कवि-राज बुन्दॆली

                            १३/०३/२०१२

 

 

 

 

 

 

 

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on March 14, 2012 at 7:08am
मै मुग्ध हूं।
Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2012 at 11:06pm

ओ.बी.ओ. मंच का आभारी हूं,,,,,,,,,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2012 at 8:15pm

संदीप जी,,,,,,,,,,,,,, तहॆ-दिल से शुक्रिया,,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on March 13, 2012 at 8:14pm

धन्यवाद,,,,,,,,,,,राजेश कुमारी जी,,,,,,,,

हम तो मुरीद हैं आपकी सटीक प्रतिक्रियाऒं के,,,,,आभार,,,,,,,,,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 13, 2012 at 7:59pm

मॊहब्बत मॆं जां लुटानॆ की बात करतॆ हैं,

मॆरॆ लहू का माप, जॊ पसीनॆ सॆ रखतॆ हैं ॥२॥

 राज बुन्देली जी बहुत उम्दा ग़ज़ल लिखी है यह शेर बहुत पसंद आया 

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 13, 2012 at 7:44pm

ज़िंदा-दिली उनकॊ न, रास आयॆगी कभी,

कम-ज़र्फ़ तॊ रिश्तॆ कमीनॆ सॆ रखतॆ हैं

लाजवाब शेर आदरणीय राज जी| बहुत ख़ूब| बधाई ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए...

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