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इतनी रात गयॆ,,,
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इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं, एकांकी आना ठीक नहीं ॥
आयॆ हॊ तॊ ठहरॊ रात गुज़रनॆ दॊ, अब वापस जाना ठीक नहीं ॥

मिलना चाहा तुमसॆ पर,आस अधूरी रही सदा,
जी रहा पपीहा बनकर,प्यास अधूरी रही सदा,
ऋतुऒं का यौवन बीता,फ़िर भी न आयॆ तुम,
पतझड़ कॆ मौसम मॆं,स्नॆह निमंत्रण लायॆ तुम,

इन चातक नयनॊं कॊ हॆ चंद्रमुखी, इतना भी तरसाना ठीक नहीं ॥१॥
इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

मॆरी दिन-चर्या मत पूंछॊ, तन्हाई का बादशाह हूं,
यादॊं कॆ सागर का माझी, पीड़ाऒं का शहंशाह हूं,
घनॆ अंधॆरॊं कॆ आंगन सॆ,अब मॆरा गहरा नाता है,
इन चौबंद घिरी दीवारॊं मॆं,रहना मुझकॊ भाता है,

इस थकॆ पथिक की पलकॊं सॆ, बॊझिल नींद चुराना ठीक नहीं ॥२॥
इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

अपनॆ हाल सुनाऒ बॊलॊ, भूली-बिसरी सब बातॆं,
कैसॆ कटतॆ थॆ तन्हा दिन,कैसॆ कटती थीं वॊ रातॆं,
जॊ फुलवारीं सींची थी हम नॆ, क्या वह फूल गईं,
याद तुम्हॆं है वॊ अमराई, या सारी बातॆं भूल गईं,

अपना कह कर अपनॊं सॆ फिर, कॊई बात छुपाना ठीक नहीं ॥३॥
इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

शब्द-शब्द धागॆ मॆं गॊया, तब तॆरा जन्म हुआ है,
आंखॊं सॆ खारा जल बॊया,तब तॆरा जन्म हुआ है,
करुणा की चादर मॆं सॊया,तब तॆरा जन्म हुआ है,
पीड़ाऒं कॊ कांधॆ मॆं ढ़ॊया,तब तॆरा जन्म हुआ है,

ऎ सुन्दरता की कल्पज काया, इतना भी इतराना ठीक नहीं ॥४॥
इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

दॆश काल का डर कैसा,सुख-दुख की परवाह नहीं,
सुविधाऒं सॆ मॊह नहीं, मुक्ति-भॊग की चाह नहीं,
नहीं सूर्य मॆं तॆज यहां, जला सकॆ जॊ मॆरा अक्षर,
नहीं प्रलय मॆं वॊ वॆग, हिला सकॆ जॊ मॆरा अक्षर,

मिथ्या कॊशिश कर शब्द-स्वयंभू का,सत्य डिगाना ठीक नहीं ॥५॥
इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

तॆरा कॊई नाम नहीं है,मॆरा ही नाम मिला तुझकॊ,
जीवन कॆ कंटक-पथ पर, लॆकर संग चला तुझकॊ,
माना श्रृष्टि कॆ आदि अंत,तक तॆरा ठौर-ठिकाना है,
मै कवि तू मॆरी कविता,अपना यह संबंध पुराना है,

सॊ जाऒ हॆ शब्द-सुंदरी अब, ज्यादा बात बढ़ाना ठीक नहीं ॥६॥
इतनी रात गयॆ सपनॊं की नगरी मॆं,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

     कवि-राज बुन्दॆली
      २२/०४/२०१२

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Comment

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Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 26, 2012 at 2:06am

छॊटू सिंह जी,,,,,,,,,,,,,धन्यवाद,,,,,,,,,,आभार,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 25, 2012 at 2:23am

Arun Kumar Pandey 'Abhinav',,,,,,किन शब्दो मे आपका शुक्रिया अदा करूं शब्द ही कम पड़ गये है,,,,आभार ,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 25, 2012 at 2:21am

PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA,,,,प्रणाम आपको,,,,,,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 1:49pm

वन्दना जी,,,,,,नारी शक्ति को इस नाचीज़ का प्रणाम,,,,,,बहुत बहुत आभार आपका,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 1:48pm

प्रदीप सिंह जी,,,,,प्रणाम आपको ,,,,आशीष बनाये रखिये,,,,,,,,,

Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 1:47pm

अभिनव जी,,,किन शब्दो में आपका शुक्रिया अदा करूं मेरे पास शब्द-कोष कम पड़ रहा है,,,,,

इतना ही कहूंगा कि ये स्नेह हमेशा बरसाते रहिये,,,,,,,,,,,,,,धन्यवाद,,,,,,,,,,,,

Comment by Abhinav Arun on April 24, 2012 at 12:51pm

दॆश काल का डर कैसा,सुख-दुख की परवाह नहीं,
सुविधाऒं सॆ मॊह नहीं, मुक्ति-भॊग की चाह नहीं,
नहीं सूर्य मॆं तॆज यहां, जला सकॆ जॊ मॆरा अक्षर,
नहीं प्रलय मॆं वॊ वॆग, हिला सकॆ जॊ मॆरा अक्षर,

कवि जी आपके शब्द प्रवाह और भाव संयोजन के क्या कहने बहुत मधुर भाव भूमि की रचना हार्दिक बधाई !!

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on April 24, 2012 at 12:36pm

पतझड़ कॆ मौसम मॆं,स्नॆह निमंत्रण लायॆ तुम,

आदरणीय राज जी, सादर अभिवादन, 
इतने सुन्दर भावों की माला. क्या कहना. बधाई.


Comment by कवि - राज बुन्दॆली on April 24, 2012 at 2:14am

शैलेन्द्र सिंह जी,,,,आभार आपका,,,,,,,,,,,

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 23, 2012 at 10:49pm

खूबसूरत कृति पर बधाई स्वीकार करें

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