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मेरी चाहत जवां होती है
तेरी हां के इंतजार में
तेरा आना, तेरा जाना
कर देता है बेकरार
मेरी चाहत जवां होती है
तेरी हां के इंतजार में
दिन पर दिन
रात दर रात
गुजरती जा रही
आंखों से नींद
दिल से चैन
गायब हो जाते रहे
अब तो हाल यह है कि
मेरी चाहत भी
मुर्दा होती जा रही
तेरी निरंतर खामोशी में

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Comment by Dr. Shashibhushan on March 21, 2012 at 8:55pm

आदरणीय हरीश जी,
सादर !
बेकरार दिल की बेकरारी ! चाहत की पुकार ! बेहतर भाव !
सुन्दर प्रस्तुति !

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 20, 2012 at 2:01pm

intjar aur khamoshi ke parjnam. badhai.

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on March 20, 2012 at 1:40pm

आदरणीय हरीश जी,

प्रेममयी भावों की सुंदर प्रस्तुति पर बधाई|

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