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(मात्रिक छंद)
उल्लाला = १५,१३ मात्रा
(मैथिली शरण गुप्त जी ने इस छंद पर कई रचनाएँ लिखी है)

(तुम सुनौ सदैव समीप है,जो अपना आराध्य है.)

*******************************************************
नहीं बड़ा परमार्थ से अब , धर्म है इस जहान में.
कभी स्वार्थ  टिक पाता नहीं,किसी आत्मा महान में.


स्वारथ में जो प्रतिपल रहा ,कलंक है नर जाति पर.
आराध्य वही मानव जिसे,न फ़िक्र जाति विजाति पर.


है नाम पुनीत दधीच का,जन हित में जीवन दिया.
रानी थी एक झाँसी हित,कुर्बां कर यौवन दिया.


 कर चयन स्वारथ की सीढ़ी , जो कोई आगे बढ़े.
प्रभु न चलूँ पद चिन्ह उसके,जो भी यह  सीढ़ी चढ़े.

  • शैलेन्द्र कुमार सिंह "मृदु'

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Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 20, 2012 at 11:19am

आदरणीया राजेशकुमारी मैम प्रोत्साहन पर कोटि कोटि धन्यवाद,


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on April 20, 2012 at 7:39am

म्रदु जी बहुत सुन्दर छंद रचे हैं आपको इस प्रयास पर हार्दिक बधाई 

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 19, 2012 at 11:30pm

आदरणीया महिमा जी प्रोत्साहन हेतु बहुत बहुत आभार आपका, बस आप लोगों के  सहयोग से ही कुछ सीखने की कोशिश कर रहा हूँ

                                                                                                 सादर

Comment by MAHIMA SHREE on April 19, 2012 at 11:05pm

है नाम पुनीत दधीच का,जन हित में जीवन दिया.
रानी थी एक झाँसी हित,कुर्बां कर यौवन दिया.

क्या बात है मृदु जी आप तो हर प्रकार के छंद में माहिर हो गए :)

आपकी मेहनत रंग दिखा  रही है  

Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 7, 2012 at 2:36am

स्वागत है मित्र शैलेन्द्र जी ! :-)

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 7, 2012 at 2:31am

सर इसका मतलब रेफ का र है तो यह  आधा अक्षर होता है जो अपने से बाद के व्यंजन के ऊपर  जाता है, यहाँ पर  वा और मा पहले से ही दीर्घ है इसलिए ऐसा हुआ है . स्थिति अब स्पस्ट होकर सामने आई,तभी तो कहा है

गुरू कुम्हार सिख कुम्भ है .............

आदरणीय अम्बरीष सर आपने मेरे उलझे सवाल को सुलझाया इसके लिए शत-शत वंदन और ह्रदय से कोटि-कोटि धन्यवाद

Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 7, 2012 at 2:29am

२   १२  १२१  २१  २१  २१   २ =२०

हो रहे अनर्थ ढेर मार काट है.  (20 मात्रा)

राजनीति में भी आज बन्द्रबाँट है.. (20 मात्रा)

२१२१      २   १    २१    २१२१  २ = २० मात्रा

(यहाँ पर भी को गिराकर पढ़ा गया है अर्थात १ मात्रा गिनी गयी है ) कृपया उच्चारण करके देखें !

एक और उदाहरण लीला वृत्त छंद (१८ मात्रा)

22    221    11    122   2 =18

तेरा सौंदर्य जब निहारूँ मैं, 18

मधुर हास पर तन मन वारूँ मैं.. 18

111  21     11    11   11  22     2 =18

आशा है शंका समाधान हो गया होगा मित्र !

Comment by Er. Ambarish Srivastava on April 7, 2012 at 2:19am

भाई शैलेन्द्र जी ! कृपया शब्द के उच्चारण के अनुसार  निम्नलिखित का अवलोकन करें !

पर मार् थ (११२१)   स्वार् थ (२१)

अर् थ (२१)

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 7, 2012 at 1:38am

श्री चन्द्र शेखर सिंह "चन्द्र" जी द्वारा रचित राग छंद (२० मात्रा) में उन्होंने भी इसी प्रकार मात्रिक गणना की है .

हो रहे अनर्थ ढेर मार काट है.

राजनीति में भी आज बन्द्रबाँट है..

एक और उदाहरण लीला वृत्त छंद (१८ मात्रा)

तेरा सौंदर्य जब निहारूँ मैं,मधुर हास पर तन मन वारूँ मैं..

श्री अम्बरीष सर कृपया वास्तविक स्थिति से अवगत कराने की कृपा करें . आपके स्नेह और मार्गदर्शन की अभिलाषा में आपका अनुज                                                      सादर

Comment by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on April 7, 2012 at 1:16am

आदरणीय वीनस सर सादर प्रणाम , सराहना और उत्साहवर्धन के लिए आपको कोटि-कोटि धन्यवाद

कृपया ध्यान दे...

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