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उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया
इस जीवन से तूने क्या लिया |
इस जीवन को तूने क्या दिया
उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया |
ता उम्र तू रहा इस कदर बेखबर
रही न तुझे अपनी जमीर की खबर |
करता रहा तू मनमानी अपनी
रही न तुझे वक्त की खबर
उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया |
करता रहा तू मेरा - मेरा
नही है , यहा कुछ तेरा - मेरा |
उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया
मनुष्य जन्म तुझे है , किसलिए मिला
इस जन्म को किया क्या सार्थक तूने |
उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया |

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Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on September 23, 2010 at 9:28pm
उम्रे तमाम गुजारी तो क्या किया |
ता उम्र तू रहा इस कदर बेखबर
रही न तुझे अपनी जमीर की खबर |

पूजा जी नमस्कार..
बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति है....बहुत ही शानदार लिख रही है आप...ऐसे ही लिखते रहे...
आशा है आगे भी आपकी रचनाएँ पढने को मिलती रहेंगी और विभिन्न रचनाओं पर आपकी टिपण्णी भी पढने को मिलेगी....

प्रीतम तिवारी(प्रीत)

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on September 22, 2010 at 10:15am
आदरणीया पूजा जी शानदार अभिव्यक्ति है यह, आपकी कविता का यह फकीराना अंदाज बहुत भाया, अच्छा लिख रही है आप, उम्मीद है आगे भी आपकी और भी रचनायें और अन्य रचनाओं पर बहुमूल्य टिप्पणी देखने को मिलेंगी | सादर !

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