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हरे भरे ये वृक्ष हमारे
 देते ठंडी ठंडी छांव |
सबको जरूरत रहती इनकी
 नगर हो या हो गाँव  ||


बसंत के प्यारे मौसम में
नई -नई पत्ती जब आती हैं  |
थोड़ी सी ही जब चले पवन
झूम झूम ये लहराती हैं  ||

आते हैं जब इन पर फल
इनकी डालें झुक जाती हैं |
ना करो तुम घमंड कभी
बिन बोले ये कह जाती हैं  ||

वृक्ष सूखकर भी देखो
कितने काम हमारे आते हैं |
स्वयं जलकर आदमी को देते रोटी
परमार्थ का पाठ हमें पढ़ते हैं  ||

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Comment by Yogi Saraswat on May 16, 2012 at 10:10am

bahut bahut shukriya shri ajay kumar bohat ji ! mere shabd aapke paas tak pahunche , bahut achchha laga ! sahyog banaye rakhiyega ! dhanywad

Comment by AjAy Kumar Bohat on May 15, 2012 at 2:11pm
वृक्ष सूखकर भी देखो
कितने काम हमारे आते हैं |
स्वयं जलकर आदमी को देते रोटी
परमार्थ का पाठ हमें पढ़ते हैं ||
sundar panktiyon ke liye badhai...
Comment by Yogi Saraswat on May 15, 2012 at 12:33pm

बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय श्री योगराज प्रभाकर जी ! आपको मेरे शब्द पसंद आये ! आपका सहयोग और समर्थन आगे भी चाहूँगा ! आपका आशीर्वाद मिला ! बहुत बहुत आभार

Comment by Yogi Saraswat on May 15, 2012 at 12:31pm

बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय राजेश कुमारी जी ! आपका सहयोग और समर्थन आगे भी चाहूँगा ! आपका आशीर्वाद मिला ! बहुत बहुत आभार

Comment by Yogi Saraswat on May 15, 2012 at 12:30pm

बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय श्री बागी जी ! आपका सहयोग और समर्थन आगे भी चाहूँगा ! आपका आशीर्वाद मिला ! बहुत बहुत आभार

Comment by Yogi Saraswat on May 15, 2012 at 12:29pm

बहुत बहुत धन्यवाद , आदरणीय महिमा जी ! सहयोग और समर्थन बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Yogi Saraswat on May 15, 2012 at 12:28pm

बहुत बहुत धन्यवाद , श्री भावेश राजपाल जी ! सहयोग और समर्थन बनाये रखियेगा ! धन्यवाद

Comment by Bhawesh Rajpal on May 15, 2012 at 4:04am
कुछ पंक्तियों में सार्थक सन्देश देती  सुन्दर रचना  ! हार्दिक बधाई योगी जी ! 
Comment by MAHIMA SHREE on May 14, 2012 at 8:58pm

आते हैं जब इन पर फल
इनकी डालें झुक जाती हैं |
ना करो तुम घमंड कभी
बिन बोले ये कह जाती हैं ...

योगी जी नमस्कार .. सुंदर अभिव्यक्ति ... बधाई आपको


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 14, 2012 at 8:49pm

सूखकर भी देखो ये वृक्ष,
काम हमारे आते हैं |
स्वयं जलकर देते रोटी
परमार्थ का पाठ पढ़ातें हैं  ||

सच यह रचना बहुत ही संदेशपरक है, मनुष्य को वृक्षों से सीख लेने की आवश्यकता है, सुन्दर भाव, कही कही प्रवाह में अटकाव है किन्तु रचना बहुत ही प्यारी है, बहुत बहुत बधाई योगी जी |

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